August 26, 2017

कंचन : बेटी बहन भाभी से बहू तक का सफ़र - 30

कन्चन का प्लान तो सफ़ल हो गया और ससुर जी के इरादे भी बिल्कुल साफ़ हो गये थे लेकिन कन्चन अभी तक ससुर जी के लंड के दर्शन नहीं कर पायी थी।

एक दिन फिर से सासु मां को शहर जाना था। इस बार रामलाल ने फिर उन्हें अकेला ही भेज दिया। बीवी के जाने के बाद वो कन्चन से बोला, "बहु आज बदन में बहुत दर्द हो रहा है ज़रा कमला को बुला दो। बहुत अच्छी मालिश करती है। बदन का दर्द दूर कर देगी।"

ये सुन के कन्चन को जलन होने लगी। वो जानती थी कमला कैसी मालिश करेगी। कन्चन ने सोचा आज अच्छा मौका है। सासु मां भी नहीं है।

वो बोली, "क्यों पिताजी? घर में बहु के रहते आप किसी और को क्यों मालिश के लिये बुलाना चाहते हैं? आपने हमारी मालिश कहां देखी है? एक बार करवा के देखिये, कमला की मालिश भूल जाएंगे।"

"अरे नहीं बेटी, हम अपनी बहु से कैसे मालिश करवा सकते हैं?" रामलाल के मन में लड्डू फूटने लगे। वो सोच रहा था की ये तो सुनहरा मौका है। हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।

"आप हमें बेटी बोल रहे हैं लेकिन शायद अपनी बेटी की तरह नहीं मानते? आपकी सेवा करके हमें बहुत खुशी मिलती है।"

"ऐसा ना कहो बहु। तुम बेटी के समान नहीं हमारी बेटी ही हो। तुम सचमुच बहुत अच्छी हो। लेकिन तुम्हारी सासु मां को पता चल गया तो वो मुझे मार डालेगी।"

"कैसे पता चलेगा पिताजी वो तो शाम तक आएगी। चलिये अब हम आपकी मालिश कर देते हैं। आपको भी तो पता चले की आपकी बहु कैसी मालिश करती है।"

"ठीक है बहु। लेकिन अपनी सासु मां को बताना नहीं।"

"नहीं बताएंगे पिताजी, आप बेफिक्र रहिये।"

रामलाल ने जल्दी से ज़मीन पे चटाई बिछा दी और धोती को छोड़ के सब कपड़े उतार के लेट गया। उसका दिल धक धक कर रहा था। कन्चन रामलाल के गठे हुए बदन को देखती ही रह गयी। वाकई में सच्चा मर्द था। चौड़ी छाती और उसपे घने काले बाल देख कर तो कन्चन के दिल पे छुरिआं चलने लगी। कन्चन ने रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। साड़ी के पल्लु से उसने घूंघट भी कर रखा था। बहु के मुलायम हाथों का स्पर्श रामलाल को बहुत अच्छा लग रहा था। कन्चन ने पहले से ही प्लान बना रखा था। अचानक तेल की बोतल कन्चन की साड़ी पे गिर गयी।

"ऊफ हमारी साड़ी खराब हो गयी।"

"बहु साड़ी पहन के कोई मालिश करता है क्या। खराब कर ली ना अपनी साड़ी? चलो साड़ी उतार लो, फिर मालिश करना।"

"जी, मैं सलवार कमीज़ पहन के आती हूं।"

"अरे उसकी क्या ज़रूरत है? साड़ी उतार लो बस। सलवार पे तेल गिर गया तो सलवार उतारनी पड़ जाएगी। अगर सलवार उतारना मंज़ूर है तो ठीक है सलवार कमीज़ पहन आओ।"

"हाय सलवार कैसे उतारेंगे। सलवार उतारने से तो अच्छा है कि साड़ी ही उतार दूं, लेकिन आपके सामने साड़ी कैसे उतारुं? हमें तो शरम आती है।’

"शरम कैसी बहु? तुम तो हमारी बेटी के समान हो। और फिर हम तो तुम्हें पेटिकोट ब्लाउज में कई बार देख चुके हैं। अपने ससुर से कोई शर्माता है क्या?"

"ठीक है पिताजी। उतार देती हूं।" कन्चन ने बड़ी अदा के साथ अपनी साड़ी उतार दी। अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउज में थी। पेटिकोट उसने बहुत नीचा बांध रखा था। ब्लाउज भी सामने से लो-कट था। अचानक कन्चन कमरे से बाहर भागी.

"अरे क्या हुआ बहु कहां जा रही हो?" रामलाल ने पूछा।

"जी बस अभी आई। अपनी चुन्नी तो ले आऊं।" रामलाल तो बहु के ऊपर नीचे होते हुए नितम्बों को देख कर निहाल हो गया।

कन्चन थोड़ी देर में वापस आ गयी। अब उसने चुन्नी से घूंघट निकाल रखा था। लेकिन कमर पे बहुत नीचे बंधे पेटिकोट और लो-कट ब्लाउज में से उसकी जवानी बाहर निकल रही थी। कन्चन रामलाल के पास बैठ गयी और उसने फिर से रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। इस वक्त कन्चन का सिर रामलाल के सिर की ओर था। मालिश करते हुए बहु इस प्रकार से झुकी हुई थी की लो-कट ब्लाउज में से उसकी बड़ी बड़ी झूलती हुई चूचिआं रामलाल को साफ़ दिखाई दे रही थी। मालिश करते हुए दोनों इधर उधर की बातें कर रहे थे। कन्चन को अच्छी तरह मालूम था की ससुर जी की नज़रें उसके ब्लाउज के अन्दर झांक रही हैं। आज तो कन्चन ने ठान लिया था कि ससुर जी को पूरी तरह तड़पा के ही छोड़ेगी। मर्दों को तड़पाने की कला में तो वो माहिर थी ही।

इतने में रामलाल ने बहु से पूछा, "बहु तुमने वो गाना सुना हई, चुन्री के नीचे क्या है? चोली के पीछे क्या है?"

"जी पिताजी सुना है। आपको अच्छा लगता है।?" कन्चन आगे झुकते हुए ससुर जी को अपनी गोरी गोरी चूचिओं के और भी ज़्यादा दर्शन कराती हुई बोली।

"हां बहु बहुत अच्छा लगता है।" कन्चन समझ रही थी की ससुर जी का इशारा किस ओर है। ससुर जी की जांघों तक मालिश करने के बाद कन्चन ने सोचा की अब ससुर जी को उसके नितम्बों के दर्शन कराने का वक्त आ गया है। कन्चन जानती थी की उसके नितम्ब मर्दों पर क्या असर करते हैं। उसने जांघों से नीचे की ओर मालिश करने के बहाने अब अपना मुंह ससुर जी के पैरों की ओर और अपने विशाल चूतड़ ससुर जी के मुंह की ओर कर दिये। मालिश करते हुए उसने अपने चूतड़ों बड़े ही मादक ढंग से पीछे की ओर उभार दिया। रामलाल के दिल पे तो मानो छुरी चल गयी। पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु की गुलाबी रंग की कच्छी झांक रही थी।

रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को ललचायी नज़रों से देखता हुआ बोला, "अरे बहु ऐसे मालिश करने में परेशानी होगी। हमारे ऊपर आ जाओ।"

"हाय राम आपके ऊपर कैसे आ सकते हैं?"

"अरे इसमें शर्माने की क्या बात है? अपनी एक टांग हमारे एक तरफ़ और दूसरी टांग दूसरी तरफ़ कर लो।"

"जी आपको परेशानी तो नहीं होगी?"

कन्चन रामलाल के ऊपर आ गयी। अब उसका एक घुटना ससुर जी के कमर के एक तरफ़ और दूसरा घुटना कमर के दूसरी तरफ़ था। पेटिकोट घुटनों तक ऊपर करना पड़ा। इस मुद्रा में कन्चन के विशाल चूतड़ रामलाल के मुंह के ठीक सामने थे। घुटनों से नीचे कन्चन के गोरे गोरे पैर नंगे थे। कन्चन रामलाल के पैरों की ओर मुंह करके उसकी जांघों से नीचे की ओर मालिश कर रही थी। रामलाल का मन कर रहा था की बहु के चूतड़ों के बीच मुंह दे दे। वो पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु के विशाल चूतड़ों पे सिमटती हुई कच्छी को देख रहा था।

"बहु तुम जितनी समझदार हो उतनी ही सुन्दर भी हो।"

"सच पिता जी? कहीं आप हमें खुश करने के लिये तो नहीं बोल रहे हैं।"

"तुम्हारी कसम बहु हम झूठ क्यों बोलेंगे? तभी तो हमनें तुम्हें एकदम राकेश के लिये पसन्द कर लिया था। शादी से पहले तुम्हारे पीछे बहुत लड़के चक्कर लगाते होंगे?"

"जी वो तो सभी लड़किओं के पीछे चक्कर लगाते हैं।"

"नहीं बहु सभी लड़किआं तुम्हारी तरह सेक्सी नहीं होती। बोलो, लड़कें बहुत तंग करते थे क्या?"

"हां पिता जी करते तो थे।"

"क्या करते थे बहु?"

"अब हम आपको वो सब कैसे बता सकते हैं?"

"अरे फिर से वही शर्माना। चलो बताओ। हमें ससुर नहीं, अपना दोस्त समझो।"

"जी सीटियां मारते थे। कभी कभी तो बहुत गन्दे गन्दे कमैन्ट भी देते थे। बहुत सी बातें तो हमें समझ ही नहीं आती थी।"

"क्या बोलते थे बहु?"

"उनकी गंदी बात हमें समझ नहीं आती थी। लेकिन इतना ज़रूर पता था की हमारी छातिओं और नितम्बों पे कमैन्ट देते थे। कैसे खराब होते हैं लड़के। घर में मां बहन नहीं होती क्या?"

"और क्या क्या करते थे?"

"जी, क्लास में भी लड़कें जान बूझ के अपनी पेन्सिल हमारे पैरों के पास फेंक देते थे और उसे उठाने के बहाने हमारी स्किर्ट के अन्दर टांगों के बीच में झान्कने की कोशिश करते थे। स्कूल की ड्रेस स्किर्ट थी नहीं तो हम सलवार कमीज़ ही पहन के स्कूल जाते। लड़कें लोग होते ही बहुत खराब हैं।"

"नहीं बहु लड़कें खराब नहीं होते। वो तो बेचारे तुम्हारी जवानी से परेशान रहते होंगे।"

"लेकिन किसी लड़की पे गंदे गंदे कमैन्ट देना और उसकी टांगों के बीच में झांकना तो बदतमीज़ी होती है ना पिताजी?"

"इसमें बदतमीज़ी की क्या बात है बहु। बचपन से ही हर मर्द के मन में औरत की टांगों के बीच में झान्कने की इच्छा होती है और जब वो बड़ा हो जाता है तब तो औरत की टांगों के बीच में पहुंचना ही उसका लक्ष्य बन जाता है।"

"हाय! ये भी क्या लक्ष्य हुआ? मर्द लोग तो होते ही ऐसे हैं।"

"लेकिन बहु लड़कियां भी तो कम नहीं होती। देखो ना आज कल तो शहर की ज्यादातर लड़कियां शादी से पहले ही अपना सब कुछ दे देती हैं। तुम भी तो शहर की हो बहु।"

"अच्छा पिता जी! क्या मतलब आपका? हम वैसे नहीं हैं। इतने लड़कें हमारे पीछे पड़े थे, यहां तक कि कई मास्टर जी लोग भी हमारे पीछे पड़े थे, लेकिन हमने तो शादी से पहले ऐसा वैसा कुछ नहीं किया।"

"सच बहु? यकीन नहीं होता की इतनी सेक्सी लड़की को लड़कों ने कुंवारा छोड़ दिया होगा।"

"हमने किसी लड़कें को आज तक हाथ भी नहीं लगाने दिया।"

"आज तक? बेचारा राकेश अभी तक कुन्वारा ही है। सुहाग रात को भी हाथ नहीं लगाने दिया?" रामलाल हंसता हुआ बोला।

"हां...पिता जी आप तो बहुत खराब हैं। सुहाग रात को तो पति का हक बनता है। उन्हें थोड़े ही हम मना कर सकते हैं।" कन्चन बड़े ही मादक ढंग से अपने चूतड़ों को रामलाल के मुंह की ओर उचकाती हुई बोली। रामलाल कन्चन के चूतड़ों से सिमट कर उनके बीच की दरार में जाती हुई कच्छी को देख देख कर पागल हो रहा था।

"बहु एक बात कहुं? तुम शादी के बाद से बहुत ही खूबसूरत हो गयी हो।"

"पिता जी आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे शादी से पहले हम बद्सूरत थे।"

"अरे नहीं बहु शादी से पहले भी तुम बहुत सन्दर थी लेकिन शादी के बाद से तो तुम्हारी जवानी और भी निखर आई है। हर लड़की की जवानी में शादी के बाद एकदम निखार आ जाता है।"

"ऐसा क्यों पिताजी?" कन्चन ने भोलेपन से पूछ.

"बहु, शादी से पहले लड़की एक कच्ची कली होती है। कली को फूल बनाने का काम तो मर्द ही कर सकता है ना। सुहाग रात को लड़की एक कच्ची कली से फूल बन जाती है। जैसे कली में फूल बनके निखार आ जाता है वैसे ही लड़की की जवानी में शादी के बाद निखार आने लगता है।"

"ऐसा क्या निखार आया हमारी जवानी में? हम तो पहले भी ऐसे ही थे।"

"बहु तुम्हारी जवानी में क्या निखार आया वो हमसे पूछो। तुम्हारा बदन एकदम भर गया है। कपड़े भी टाईट होने लगे हैं। देखो ये नितम्ब कैसे फैल गये हैं।" रामलाल कन्चन के दोनों चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।

"तुम्हारी ये कच्छी भी कितनी छोटी हो गयी है। करीब करीब पूरे ही नितम्ब इस कच्छी के बाहर हैं। शादी से पहले तो ऐसा नहीं था ना?"

आखिर कन्चन का प्लान सफ़ल होने लगा था। रामलाल का हाथ उसके उचके हुए चूतड़ों को सहला रहा था। कभी कभी रामलाल उसकी पैंटी लाईन पे हाथ फेरता। कन्चन को बहुत मज़ा आ रहा था।

रामलाल फिर बोला, "बहु लगता है तुम्हें ये गुलाबी रंग की कच्छी बहुत पसन्द है?"

"हाय! पिताजी आपको कैसे पता हमने कौन से रंग की कच्छी पहनी है?"

"बहु तुम्हारे नितम्ब हैं ही इतने चौड़े की उनके ऊपर कसे हुए पेटिकोट में से कच्छी भी नज़र आ रही है।"

"हाय राम! पिताजी हमें सलवार कमीज़ पहनने दीजिये। हमें शरम आ रही है।"

"अरे बहु शरम कैसी तुम तो हमारी बेटी के समान हो।" रामलाल कन्चन की कच्छी पे हाथ फेरता हुआ बोला। कन्चन भी रामलाल की टांगों पे मालिश करने का नाटक कर रही थी। रामलाल बहु के विशाल नितम्बों को दबाता हुआ बोला, "बहु तुम राजेश का ख्याल तो रखती हो ना?"

"जी आप बेफिकर रहिये हम उनका बहुत ख्याल रखते हैं। जब हम आपका इतना ख्याल कर सकते हैं तो क्या उनका नहीं करेंगे? उन्हें हमसे कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।"

"शाबाश बहु हमें तुमसे यही उम्मीद थी। लेकिन हमारा मतलब था की इस लाजवाब जवानी को बेकार तो नहीं कर रही हो। राजेश को खुश तो रखती हो। वो जो कुछ चाहता है उसे देती हो ना।"

"जी वो जो चाहते हैं हम उन्हें देते हैं। जैसा खाना पसन्द है वैसा ही बनाते हैं।" कन्चन रामलाल का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी लेकिन अन्जान बनने का नाटक कर रही थी।

"बहु, तुम तो बहुत भोली हो। हम खाने पीने की बात नहीं कर रहे। खाने पीने के इलावा भी मर्द की ज़रूरतें होती हैं जिंहें अगर बीवी पूरा ना करे तो मर्द दूसरी औरतों के पास जाने लगता है। उसे अपनी जवानी रोज़ देती हो कि नहीं?"

कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई बोली, "पिताजी आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है।"

"अपने ससुर से क्या शर्माना बहु? हमारी बहु खुश है या नहीं ये जानना हमारा फर्ज़ है। बोलो है या नहीं?"

"जी है।"

"तो फिर बताओ उसे रोज़ देती हो या नहीं?" रामलाल का हाथ अब फिसल कर कन्चन के चूतड़ों की दरार में आ गया था। वो उसके चूतड़ों की दरार में हाथ फेरता हुआ बोला "बोलो बहु शर्माओ नहीं।"

"ज्ज्ज...जी, वो जब चाहते हैं ले लेते हैं। हम कभी मना नहीं करते।"

"वो जब चाहता है तब लेता है। तुम अपने आप कभी नहीं देती हो?"

"हुम तो औरत हैं। पहल करना तो मर्द का काम होता है।" कन्चन ने मन ही मन सोचा की रामलाल ने कितने सफ़ाई से लेने देने की बातें शुरु कर दी थी और अब तो उसके चूतड़ों की दरार में भी हाथ फेर रहा था। सचमुच ससुर जी काफ़ी मंझे हुए खिलाड़ी थे।

रामलाल बोल रहा था,"बहु तुम इतनी सेक्सी हो। वो नालायक तो तुम्हारी रोज़ लेता होगा?"

"पिता जी प्लीज़...! आप ये सब क्यों पूछ रहे हैं? हुमें तो बहुत शरम आ रही है।"

"अभी हमनें कहा था की हमारा बेटा और बहु खुश हैं या नहीं ये जानना हमारा फ़र्ज़ है। जबाब दो। रोज़ लेता तो है ना तुम्हारी?"

"नहीं पिताजी ऐसी कोई बात नहीं है। उन्हें तो फुर्सत ही नहीं मिलती। ओफ़िस से थक के आते हैं और जल्दी ही सो जाते हैं। महीने में मुश्किल से एक दो बार ही.....हमें तो लगता है की शायद हम इतने सैक्सी हैं ही नहीं कि हम उन्हें रिझा सकें।"

"कैसी बातें करती हो बहु? तुम तो इतनी सन्दर ओर सेक्सी हो कि तुम्हें कपड़ों में देख कर भी किसी बाल ब्रह्मचारी का लंड खड़ा हो जाए और अगर नंगी हो जाओ तब तो भगवान भी अपने पे काबू नहीं कर सकते।" पहली बार रामलाल ने कन्चन के सामने लंड जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। चूतड़ों की दरार में हाथ रगड़ने और रामलाल के मुंह से इस तरह की बातें सुन के कन्चन की चूत गीली होने लगी थी।

वो शर्माने का नाटक करते हुए बोली, "हाय! पिताजी आप अपनी बहु के सामने ये कैसे गन्दे शब्द बोल रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है। प्लीज़ अब हमें जाने दीजिये ना।"

रामलाल दोनों हाथों से कन्चन के विशाल चूतड़ों को दबाता हुआ बोला, "अरे बहु इसमें शर्माने की क्या बात है। अब मर्द के लंड को लंड नहीं तो और क्या कहें? बोलो तुम्हारे पास लंड के लिये कोई और शब्द है तो बताओ।"

कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई चुप रही।

"अरे बहु बोलो! चुप क्यों हो?"

"जी हमें नहीं पता। हमनें भी लड़कों के मुंह से ये ही शब्द सुना है।"

"तो फिर लंड को लंड कहने में शरम कैसी? लेकिन बहु महीने में सिर्फ़ एक दो बार से तुम्हारा काम चल जाता है? तुम्हारी इस जवानी को तो रोज़ मर्द की ज़रूरत है।"

"अब हम कर भी क्या सकते हैं?"

"उसे तुम्हारी पसन्द तो है न?"

"जी, हमें क्या पता?"

"ये बात तो हर औरत को पता होनी चाहिये। वैसे कुछ मर्दों को वो औरतें पसन्द होती हैं जिनकी बहुत फूली हुई होती है। तुम्हारी कैसी है बहु?" रामलाल मज़े लेता हुआ बोला।

"जी हमें क्या पता?"

"बहु तुम्हें कुछ पता भी है? चलो हम ही पता कर लेते हैं हमारी बहु रानी की कैसी है।" ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।

ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।

"ऊइइइइइइइइई.......इइस्स्स...। पिता जी !आआआह....... प्लीज़! ये आप क्या कर रहे हैं? छोड़िये ना....। हम आपकी बहु हैं।" लेकिन कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि अपनी टांगें इस प्रकार से चौड़ी कर ली और चूतड़ ऊपर की ओर उचका दिये कि उसकी चूत रामलाल के हाथ में ठीक तरह से समा जाए। कन्चन के पूरे बदन में वासना की लहर दौड़ रही थी।

"क्या छोड़ू बहु?"

"वही जो आपने पकड़ रखी है। प्लीईइइइइज......छोड़िये ना आह आह......"

"हमनें क्या पकड़ रखी है? बता दो तो छोड़ देंगे।"

"वही जो औरतों की टांगों के बीच में होती है।"

"क्या होती है बहु?"

"ऊफ! पिताजी आप तो बड़े वो हैं! छोड़िये ना हमारी...प्लीज़...आह"

"जब तक बताओगी नहीं कि क्या छोड़ें तब तक हमें कैसे पता चलेगा की क्या छोड़ना है?"

"हाय राम! हमें सचमुच नहीं पता उसे क्या कहते हैं। आप ही बता दीजिये।"

"बहु तुम इतनी भी भोली नहीं हो। चलो हम ही बता देते हैं। इसे चूत कहते हैं।"

"ठीक है हमारी....हमारी..च..चूत छोड़ दीजिये प्लीज़...हम आपकी बहु हैं।"

"हां, अब हुई ना बात बहु। ’चूत’ बोलने में इतना शर्माती हो, कहीं चूत देने में भी तो इतना नहीं शर्माती? तभी बेचारा राकेश तुम्हारी ले नहीं पाता होगा।" रामलाल कन्चन की चूत मुट्ठी में मसलता हुआ बोला।

"इस्स्स्स्स्स......... क्या कर रहे हैं? प्लीज़ छोड़िये ना हमारी..."

"पहले बताओ, चूत देने में भी इतना शर्माती हो?"

"नहीं, पहले आप हमारी छोड़िये। फिर बताऊंगी।"

"फिर वही बात। हमारी छोड़िये, हमारी छोड़िये कर रही हो। आखिर क्या छोड़ें?"

"ऊफ पिता जी आप तो बहुत ही खराब हैं। प्लीज़ हमारी चूत छोड़ दिजिये। हम तो आपकी बेटी के समान हैं।"

"ठीक है बहु ये लो छोड़ देते हैं।" जैसे ही रामलाल ने कन्चन की चूत को आज़ाद किया वो रामलाल के ऊपर से उठ कर साईड में बैठ गयी।

"पिताजी आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु के साथ ऐसा करता है कोई? अब हम आपकी मालिश साईड में बैठ कर ही करेंगे।"

"अरे बहु की चूत पकड़ना मना है क्या? ठीक है साईड में बैठ के मालिश कर दो। लेकिन बहु तुम्हारी चूत तो बहुत फूली हुई है। मर्द तो ऐसी ही चूत के लिये तरसते हैं। अब बताओ, अपनी इस प्यारी चूत को देने में तो शरम नहीं करती हो।"

"जी, देने में किस बात की शरम? वैसे भी जब वो लेते हैं तो लाईट बन्द होती है। उन्हें कैसे पता चलेगा की हमारी कैसी है?"

"शबाश बहु चूत देने में कोई शरम नहीं करनी चाहिये। लेकिन वो नालायक लाईट बन्द करके चोदता है तुम्हें? तुम जैसी सन्दर और सेक्सी औरत को तो नंगी देखने के लिये भगवान भी तड़प जाए। औरत को चोदने का मज़ा तो उसे पूरी तरह नंगी करके ही आता है। और उसकी नंगी जवानी का रस पान करने के लिये लाईट जला के चोदना तो ज़रूरी है।" कन्चन ने नोटिस किया की रामलाल ने अब ‘लेने देने’ की जगह ‘चोदने’ जैसा शब्द बोलना शुरु कर दिया था।

"लेकिन पिता जी वो तो ऐसा कुछ भी नहीं करते।"

"तुम्हारा मतलब वो तुम्हें नंगी तक नहीं करता?"

"जी नहीं।" कन्चन शर्माते हुए बोली।

"तो फिर?"

"फिर क्या?"

"तो फिर कैसे चोदता है वो हमारी प्यारी बहुरानी को?"

"बस पेटिकोट ऊपर उठा के...."

"बहुत ही नालायक है। लेकिन उसका लंड बड़ा तो है न?"

"जी वो तो खासा लम्बा और मोटा है।"

"उस गधे के लंड जैसा? तब तो हमारी बहु की तृप्ति कर देता होगा।"

"हाय...! उस गधे के जितना तो किसी का भी नहीं हो सकता, और फिर सिर्फ़ बड़ा होने से कुछ नहीं होता। मर्द को भी तो औरत को तृप्त करने की कला आनी चाहिये। वो तो अक्सर पैंटी भी नहीं उतारते, बस साईड में करके ही कर लेते हैं।"

"ये तो गलत बात है। ऐसे तो हमारी बहु की प्यास शान्त नहीं हो सकती। लेकिन बहु तुम्हें ही कुछ करना चाहिये। अगर औरत काम कला में माहिर ना हो तो मर्द दूसरी औरतों की ओर भागने लगता है। बीवी को बिस्तर में बिल्कुल रंडी बन जाना चाहिये तभी वो अपने पति का दिल जीत सकती है।"

"आपकी बात सही है पिताजी, हम तो सब कुछ करने के लिये तयार हैं। लेकिन मर्द अपनी बीवी के साथ जो कुछ भी करना चाहता है उसके लिये पहल तो उसे ही करनी होती है ना। वो जो भी करना चाहें हम तो हमेशा उनका साथ देने के लिये तैयार हैं।"

"हमें लगता है की हमारी बहु प्यासी ही रह जाती है। क्यों सही बात है?"

"जी।"

"कहो तो हम उसे समझाने की कोशिश करें? ऐसा कब तक चलेगा ?"

"नही नहीं पिताजी, उनसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है।"

"तो फिर ऐसे ही तड़पती रहोगी बहु?"

"और कर भी क्या सकते हैं?"

रामलाल को अब विश्वास हो गया था कि उसका बेटा बहु के जिस्म की प्यास को नहीं बुझा पता है। इतनी खूबसूरत जवानी को इस तरह बर्बाद करना तो पाप है। अब तो उसे ही कुछ करना होगा। कन्चन फिर से रामलाल की टांगों की मालिश करने लगी। कन्चन का मुंह अब रामलाल की ओर था। बार बार इस तरह से झुकती की उसकी बड़ी बड़ी चूचिआं और ब्रा रामलाल को नज़र आने लगते। रामलाल अच्छी तरह जानता था कि आज सुनेहरा मौका था। लोहा भी गरम था। आज अगर बहु की जवानी लूटने में कामयाब हो गया तो ज़िन्दगी बन जाएगी। रामलाल का लंड बुरी तरह फनफनाया हुआ था, और टाईट लंगोट की साईड में से आधा बाहर निकल आया था और उसकी जांघ के साथ सटा हुआ था।

रामलाल बोला, "देखो बहु तुम चाहती हो तुम्हारी जवानी की आग ठंडी हो?"

"जी कौन औरत नहीं चाहती?"

"हम तुम्हारे ससुर हैं। तुम्हारी जवानी की आग को ठंडा करना हमारा धर्म है। हमें ही कुछ करना होगा।"

"आप क्या कर सकते हैं पिताजी? हमारी किस्मत ही ऐसी है।" कन्चन एक ठंडी सांस लेते हुए रामलाल की जांघ पे तेल लगती हुई बोली।

"ऐसा ना कहो बहु। अपनी किस्मत तो अपने हाथ में होती है। अरे बहु, तुमने हमारी कमर से ले के टांगों तक तो मालिश कर दी लेकिन एक जगह तो छोड़ ही दी।"

"कौन सी ?"

"अरे धोती के नीचे भी बहुत कुछ है। वहां भी मालिश कर दो।"

"जी वहां...?"

"भई नहीं करना चाहती हो तो कोई बात नहीं हम वहां कमला से मालिश करवा लेंगे।"

"नहीं नहीं पिताजी कमला से क्यों? हम हैं ना।" कन्चन ने शर्माते हुए रामलाल की धोती ऊपर कर दी। नीचे का नज़ारा देख के उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। कसे हुए लंगोट का उभार देखने लायक था। कन्चन ने लंगोट वाले इलाके को छोड़ के लंगोट के चारों ओर मालिश कर दी।

"लीजिये पिताजी वहां भी मालिश कर दी।"

"बहु वहां तो अभी और भी बहुत कुछ है।"

"और तो कुछ भी नहीं है।"

"ज़रा लंगोट के नीचे तो देखो बहुत कुछ मिलेगा।"

"हाय.....! लंगोट के नीचे! वहां तो आपका वो है। हमें तो बहुत शरम आ रही है।"

"शरम कैसी बहु? तुम तो ऐसे शर्मा रही हो जैसे कभी मर्द का लंड नहीं देखा।"

"जी किसी पराए मर्द का तो नहीं देखा ना।"

"अच्छा तो तुम हमें पराया समझती हो?"

"नहीं नहीं पिता जी ऐसी बात नहीं है।"

"अगर ऐसी बात नहीं है तो इतना शर्मा क्यों रही हो? वो तुम्हें काटेगा नहीं। चलो लंगोट खोल दो ओर वहां की भी मालिश कर दो।"

"जी हम तो आपकी बहु हैं। हम आपके उसको कैसे हाथ लगा सकते हैं?"

"ठीक है बहु कोई बात नहीं, वहां की मालिश हम कमला से करवा लेंगे।"

"नहीं नहीं पिताजी ये आप क्या कह रहे हैं? किसी परायी औरत से तो अच्छा है हम ही वहां की मालिश कर दें।"

"तो फिर शर्मा क्यों रही हो बहु?" ये कहते हुए रामलाल ने बहु का हाथ पकड़ के लंगोट पे रख दिया। लंगोट के ऊपर से ससुर जी के मोटे लंड की गर्माहट से कन्चन कांप गयी। कांपते हुए हाथों से कन्चन ससुर जी का लंगोट खोलने की कोशिश कर रही थी। आखिर आज ससुर जी का लंड देखने की मुराद पूरी हो ही जाएगी। जैसे ही लंगोट खुला रामलाल का लंड लंगोट से अज़ाद होके एक झटके के साथ तन के खड़ा हो गया। ११ इन्च के लम्बे मोटे काले लंड को देख के कन्चन के मुंह से चीख निकल गयी।

"ऊइई माआआआ....ये क्या है..?"

"क्या हुआ बहु...?"

"जी..इतना लम्बा..."

"नहीं पसन्द आया?"

"जी वो बात नहीं है। मर्द का इतना बड़ा भी हो सकता है? सच पिताजी ये तो बिकुल उस गधे के जैसा है। अब समझी सासु मां आपको क्यों गधा कहती हैं।"

"घबराओ नहीं बहु हाथ लगा के देख लो। काटेगा नहीं।" कन्चन मन ही मन सोचने लगी काटेगा तो नहीं लेकिन मेरी चूत ज़रूर फाड़ देगा। बाप का लंड तो बेटों के लंड से कहीं ज़्यादा तगड़ा निकला कन्चन उस फौलादी लौड़े को सहलाने के लिये बेचैन तो थी ही। उसने ढेर सारा तेल अपने हाथ में ले के रामलाल के तने हुए लौड़े पे मलना शुरु कर दिया। ना जाने कितनी चूतों का रस पी के इतना मोटा हो गया था। क्या भयन्कर सुपाड़ा था। मोटा लाल हथोड़े जैसा। कुन्वारी चूत के लिये तो बहुत खतरनाक हो सकता था। कन्चन को दोनों हाथों का इस्तेमाल करना पड़ रहा था, फिर भी रामलाल का लौड़ा उसके हाथों में नहीं समा रहा था। इतना मोटा था कि दोनों हाथों से उसकी मोटाई नापनी पड़ी। जब जब कन्चन का हाथ लंड पे मालिश करते हुए नीचे की ओर जाता, लंड का मोटा लाल सुपाड़ा और भी ज़्यादा भयन्कर लगने लगता।

"पिता जी एक बात पूछुं? बुरा तो नहीं मानेंगे?"

"नहीं बहु ज़रूर पुछो।"

"जी सासु मां तो आपसे बहुत खुश होंगी?"

"वो क्यों?" रामलाल अन्जान बनता हुआ बोला।

"इतना लम्बा और मोटा लौड़ा पा कर के कौन औरत खुश नहीं होगी?"

"अरे नहीं बहु ये ही तो हमारी बदकिस्मती है। बस एक गलती कर बैठे, उसका फल अभी तक भुगत रहे हैं।"

"कैसी गलती पिताजी?"

"अरे बहु सुहाग रात को जोश जोश में कुछ ज़्यादा ज़ोर से धक्के मार दिये और पूरा लंड तुम्हारी सासु मां की चूत में पेल दिया। तुम्हारी सासु मां तो कुन्वारी थी। झेल नहीं सकी। बहुत खून खराबा हो गया था। बेचारी बेहोश हो गयी थी। बस उसके बाद से मन में इतना डर बैठ गया की आज तक चुदवाने से डरती है। बड़ी मिन्नत करके ६ महीने में एक बार चोद पाते हैं, उसके बाद भी आधे से ज़्यादा लंड नहीं डालने देती।"

"ये तो गलत बात है। पति की ज़रूरत पूरी करना तो औरत का धर्म होता है। कोशिश करती तो कुछ दिनों में सासु मां की आदत पड़ जाती।"

"क्या करें हमारी दास्तान भी कुछ तुम्हारे जैसी है।"

"ओह ! फिर तो आप भी हमारी तरह प्यासे हैं।"

"हां बहु। सासु मां को तो हमारा पसन्द नहीं आया लेकिन तुम्हें हमरा लंड पसन्द आया या नहीं?"

"जी ये तो बहुत प्यारा है। इतना बड़ा तो औरत को बड़े नसीब से मिलता है। सच, हमें तो सासु मां से जलन हो रही है।" कन्चन बड़े प्यार से रामलाल के लौड़े को सहलाते हुए बोली। उसने फिर से अपना मुंह रामलाल की टांगों की ओर और चूतड़ रामलाल के मुंह की ओर कर रखे थे। लंड और टांगों की मालिश करने के बहाने वो आगे की ओर झुकी हुई थी और चूतड़ रामलाल की ओर उचका रखे थे।

"अरे इसमें जलन की क्या बात है? आज से ये तुम्हारा हुआ।" रामलाल बहु के चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।

"जी मैं आपका मतलब समझी नहीं।"

"देखो बहु, हमसे तुम्हारी बर्बाद होती ये जवानी देखी नहीं जाती। हमारे रहते हमारी प्यारी बहु तड़पती रहे ये तो हमारे लिये शर्म की बात है। आखिर हम भी तो मर्द हैं। हमारे पास भी वो सब है जो तुम्हारे उस नालायक पति के पास है। अब हमें ही अपनी बहु की प्यास बुझानी पड़ेगी।" रामलाल का हाथ पेटिकोट के ऊपर से ही बहु के विशाल चूतड़ों की दरार में से होता हुआ उसकी चूत पे आ गया।

"हाय....! पिता जी ये आप क्या कह रहे हैं? आपका मतलब आप हमें....अपनी बहु को..?"

"हां बहु हम अपनी बहु को चोदेंगे। तुम्हारी इस जवानी को एक मोटे तगड़े लौड़े की ज़रूरत है। हमारी टांगों के बीच में अब भी बहुत दम है।" रामलाल का हाथ अब धीरे धीरे बहु की टांगों के बीच उसकी फुली हुई चूत को पेटिकोट और पैंटी के ऊपर से ही सहला रहा था।

"पिता जी..! प्लीज़..! ऐसा नहीं कहिये। हम आपके जज्बात समझते हैं लेकिन आखिर हम आपकी बहु हैं। आपके बेटे की पत्नी हैं। आपकी बेटी के समान हैं।" कन्चन रामलाल के बड़े बड़े टट्टों को सहलाती हुई बोली।

"ये सब सही है। तुम हमारी बहु हो, हमारी बेटी के समान हो। तभी तो हमारा फर्ज़ है कि हम तुम्हें खुश रखें। कोई गैर औरत होती तो हमें चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। लेकिन अपनी ही बहु के साथ ऐसा अत्याचार हो ये हमें मन्ज़ूर नहीं।" रामलाल ने ये कहते हुए बहु की चूत को अपनी मुट्ठी में भर के दबा दिया।

"इस्स्स्स्स...... अआह..छोड़िये ना पिताजी, आपने तो फिर पकड़ ली हमारी। सोचिये बेटी के समान बहु के साथ ऐसा करना पाप नहीं होगा?" कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि टांगें इस प्रकार चौड़ी कर ली की रामलाल अच्छी तरह उसकी चूत पकड़ सके।

रामलाल बहु की चूत को और भी ज़ोर से मसलता हुआ बोला, "तो क्या ये जानते हुए भी की बेटी के समान बहु की चूत प्यासी है हम चुप बैठे रहें? जब बहु मायका छोड़ के ससुराल आती है तो ससुराल वालों का फर्ज़ बनता है की वो अपनी बहु की सब ज़रूरतों का ख्याल रखें।"

"लेकिन हमने तो आपको पिता के समान माना है, अब आपके साथ ये सब कैसे कर सकते हैं।"

"ठीक है बहु, अगर हमारे साथ नहीं कर सकती तो कोई बात नहीं हम गावं में एक ऐसा तगड़ा मर्द ढूंढ लेंगे जिसका लंड हमारी तरह लम्बा हो और जो हमारी बहु को अच्छी तरह चोद के उसके जिस्म की प्यास बुझा सके। बोलो ये मन्ज़ूर है?"

"हाय राम!.....ये क्या कह रहे हैं? किसी दूसरे से तो अच्छा है कि आप ही..." कन्चन दोनों हाथों से अपना मुंह छुपाती हुई बोली।

"इसमे शर्माने की क्या बात है? बोलो क्या कहना चाहती हो बहु?" रामलाल ने अब अपना हाथ बहु के पेटिकोट के अन्दर डाल दिया था और उसकी जांघें सहला रहा था।

"जी। हमारा मतलब था की अगर इतनी ही मजबूरी हो जाए तो घर की इज़्ज़त तो घर में रहनी चाहिये। किसी गैर मर्द को हम अपनी जवानी कैसे दे सकते हैं? हमारी इज़्ज़त घर वालों के पास ही रहेगी।"

"तो तुम हमें तो गैर नहीं समझती हो?"

"नहीं नहीं, पिताजी आप गैर कैसे हो सकते है?"

"सच बहु तुम जितनी खूबसूरत हो उतनी ही समझदार भी हो। घर की इज़्ज़त घर में ही रहनी चाहिये। तुम्हारी सब ज़रूरतें घर में ही पूरी की जा सकती हैं। हम इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे कि तुम्हें किसी गैर मर्द के लंड की ज़रूरत ना महसूस हो।" रामलाल समझ गया था की बहु भी वासना की आग में जल रही है क्युंकि उसकी कच्छी उसकी चूत के रस से बिल्कुल भीग चुकी थी। लेकिन अपने ससुर से चुदवाने में झिझक रही थी। बहु की झिझक दूर करने के लिये उसे शुरु में थोड़ी ज़ोर ज़बर्दस्ती करानी पड़ेगी। लोहा गरम है, अगर अभी इस सुनहरे मौके का फयदा नहीं उठाया तो फिर बहु को नहीं चोद पायेगा। लेटे लेटे तो कुछ कर पाना मुश्किल था। रामलाल उठ के खड़ा हो गया।

"क्या हुआ पिता जी आप कहां जा रहे हैं?"

"कहीं नहीं बहु, अब तुम ठीक से सब जगह तेल लगा दो।"

रामलाल के खड़े होते ही उसकी धोती और लंगोट नीचे गिर गये। अब वो बिल्कुल नंगा बहु के सामने खड़ा था। उसका तना हुआ ११ इन्च का मोटा काला लंड बहुत भयन्कर लग रहा था। ये नज़ारा देख के कन्चन की तो सांस ही गले में अटक गयी। उसने खड़े हुए ससुर जी की टांगों में तेल लगाना शुरु किया। ससुर जी का तना हुआ लौड़ा उसके मुंह से सिर्फ़ कुछ इन्च ही दूर था। कन्चन का मन कर रहा था की उस मोटे मूसल को चूम ले।

"बहु थोड़ा हमारी छाती पे भी मालिश कर दो।"

ससुर जी की छाती पे मालिश करने के लिये कन्चन को भी खड़ा होना पड़ा। लेकिन ससुर जी का तना हुआ लंड उसे नज़दीक नहीं आने दे रहा था।

वो ससुर जी को छेड़ते हुए हंसती हुई बोली, "पिता जी, आपका गधे जैसा वो तो हमें नज़दीक आने ही नहीं दे रहा, आपकी छाती पे कैसे मालिश करें?"

"तुम कहो तो काट दें इसे बहु?"

"हाय राम! ये तो इतना प्यारा है। इसे नहीं काटने देंगे हम।" कन्चन ससुरजी के लौड़े को बड़े प्यार से सहलाती हुई बोली।

"तो फिर हमें कुछ और सोचना पड़ेगा।"

"हां पिताजी कुछ करिये ना। आपका ये तो बहुत परेशान कर रहा है।"

"ठीक है बहु, हम ही कुछ करते हैं।" ये कहते हुए रामलाल ने बहु के पेटिकोट का नाड़ा खींच दिया। नाड़ा खुलते ही पेटिकोट बहु की टांगों में गिर गया। दूसरे ही पल रामलाल ने बहु की बगलों में हाथ डाल के उसे ऊपर उठा लिया और खींच के अपनी बाहों में जकड़ लिया। इससे पहले की कन्चन की कुछ समझ में आता, उसने अपने आप को ससुर जी की छाती से चिपका पाया। वो सिर्फ़ ब्लाउज और पैंटी में थी। उसका पेटिकोट पीछे ज़मीन पे पड़ा हुआ था। ससुर जी का विशाल लंड उसकी टांगों के बीच ऐसे फंसा हुआ था जैसे वो उसकी सवारी कर रही हो।

"ऊई माआआ... पिताजीईईई..... ये आपने क्या किया? छोड़िये ना हमें।" कन्चन अपने आप को छुड़ाने का नाटक करती हुई बोली।

"तुम ही ने तो कहा था की हमारा लंड तुम्हें नज़दीक नहीं आने दे रहा है। देखो ना अब प्रोब्लम दूर हो गयी।"

"सच आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु का पेटिकोट कोई ऐसे उतारता है?"

"मजबूरी थी बहु उतारना पड़ा। तुम्हारा पेटिकोट तुम्हें नज़दीक नहीं आने देता। लेकिन अब देखो ना तुम हमारे कितनी नज़दीक आ गयी हो।" रामलाल दोनों हाथों से बहु के विशाल चूतड़ों को दबा रहा था। बेचारी छोटी सी कच्छी मोटे मोटे चूतड़ों की दरार में घुसी जा रही थी। रामलाल के मोटे लौड़े ने बहु की कच्छी के कपड़े को सामने से भी उसकी चूत की दोनों फांकों के बीच में घुसेड़ दिया था। कन्चन को रामलाल के लंड की गर्माहट बेचैन कर रही थी। इतने दिनों से जिस लंड के सपने ले रही थी वो आज उसकी जांघों के बीच फंसा हुआ उसकी चूत से रगड़ खा रहा था।

"आय हाय! कितने मजबूर हैं आप जो आपको अपनी बहु का पेटिकोट उतारना पड़ा। लेकिन ऐसे चिपके हुए हम आपकी छाती की मालिश कैसे कर सकते हैं? छोड़िये ना हमें प्लीज़।"

"कोई बात नहीं बहु छाती पे नहीं तो पीठ पे तो मालिश कर सकती हो।" कन्चन ससुर जी के बदन से बेल लता की तरह लिपटी हुई थी। उसका सिर ससुर जी की छाती पे टिका हुआ था। उसने दोनों हाथों से पीठ की मालिश शुरु कर दी। रामलाल भी बहु की पीठ और चुतड़ों पे हाथ फेर रहा था। रामलाल के लौड़े से रगड़ खा के कन्चन की चूत बुरी तरह गीली हो गयी थी और पैंटी भी बिल्कुल उसके रस में भीग गयी थी। रामलाल के लंड का ऊपरी भाग बहु की चूत के रस में भीगा हुआ था। कन्चन का सारा बदन वासना की आग में जल रहा था।

"बहु तुम हमारी पीठ की मालिश करो, हम भी तुम्हारी पीठ की मालिश कर देते हैं।" रामलाल ने अपने हाथों में तेल ले कर बहु की पीठ पे मलना शुरु कर दिया। धीरे धीरे उसने बहु के विशाल नितम्बों पे से उसकी पैंटी को उनके बीच की दरार में सरका दिया और दोनों नितम्बों की दबा दबा के मालिश करने लगा। कन्चन के मुंह से हल्की हल्की सिसकियां निकल रही थी। पीठ पे मालिश करने के बहाने धीरे धीरे रामलाल ने बहु के ब्लाऊज के हुक खोल के ब्रा का हुक भी खोल दिया। कन्चन को महसूस तो हो रहा था की शायद ससुर जी उसके ब्लाउज और ब्रा का हुक खोल रहे हैं लेकिन वो अन्जान बनी रही।

जब ससुर जी ने उसका ब्लाउज और ब्रा को उतारना शुरु किया तो वो हड़बड़ा के बोली, "हाय राम!... पिताजी.. ये क्या कर रहे हैं? हमारा ब्लाउज क्यों उतार रहे हैं?" लेकिन कन्चन ने रामलाल से अलग होने की कोई कोशिश नहीं की।

"कहो तो बहु तुम्हारे ब्लाउज के ऊपर ही तेल लगा दें? बिना ब्लाउज उतारे तुम्हारी पीठ की कैसे मालिश होगी?" और इससे पहले की कन्चन कुछ बोलती रामलाल ने एक हाथ से बहु को अपने चिपका के रखा और दूसरे हाथ को ढीले हुए ब्रा के अन्दर डाल कर बहु की बड़ी बड़ी चूचिओं को मसलने लगा। कन्चन की चूचिओं पे मर्द का हाथ लगे दो महीने हो चुके थे। वो तो अब वासना आग में पागल हुई जा रही थी।

"इस्स्स....आआआआह...पिताजी......इस्स्स्स्स्स्स...ऐइइई...अआ..छोड़िये ना..अआह...धीरे...अब छोड़ दीजिये हमें...प्लीज़...आअआ...इआआह....इस्स्स्स्स धीरे....क्या कर रहे हैं?"

"कुछ नहीं बहु, तुम तो हमारी छाती पे मालिश कर नहीं सकी, हमनें सोचा हम ही अपनी बहु की छाती पे मालिश कर देते हैं।" बातों बातों में रामलाल ने बहु का ब्लाउज और ब्रा उसके बदन से अलग कर दिया। अब बहु के बदन पे सिर्फ़ एक छोटी सी कच्छी थी। रामलाल ने एक हाथ नीचे की ओर ले जा के बहु के चूत पे से उसकी कच्छी को साईड में कर दिया। अब रामलाल का लंड बहु की नंगी चूत से रगड़ रहा था।

"इस्स्स्स...हटिये भी पिताजी। आप तो सच मुच बहुत खराब हैं। अपनी जवान बहु को इस तरह कोई नंगी करता है? अब हमें कपड़े पहनने दीजिये।"

"बहु इसे कोई नंगी करना थोड़े ही कहते हैं। तुम्हें किसी मर्द ने नंगी करके चोदा जो नहीं है, इसीलिये नंगी होने का मतलब नहीं समझती हो। अभी तो तुम कच्छी पहने हुए हो।"

"हाय राम! तो अभी हमारी कच्छी भी उतारेंगे क्या?"

"हां बहु।"

"नहीं ना पिताजी...प्लीज़.. आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?"

"बहु, एक मर्द, औरत की कच्छी क्यों उतारता है?"

"जी वो... हमारा मतलब है...म्म्म्म...आआह"

"शर्माओ नहीं, बताओ तुम्हारा पति तुम्हारी कच्छी क्यों उतारता है?"

रामलाल बहु की चूचिआं मसल रहा था और उसका मोटा लम्बा लंड बहु की चूत की दोनों फांकों के बीच से होता हुआ पीछे की ओर दोनों नितम्बों के बीच में से झांक रहा था। कन्चन से अब और सहन नहीं हो रहा था। वो चाहती थी की ससुर जी अब जल्दी से जल्दी अपना गधे जैसा लौड़ा उसकी चूत में पेल दें। लेकिन एक तो औरत जात थी ऊपर से रिश्ता भी कुछ ऐसा था।

"बोलती क्यों नहीं बहु?"

"जी, वो तो हमें.. हमारा मतलब है.. वो तो हमें चोदने के लिये हमारी कच्छी उतारते हैं।" कन्चन दोनों हाथों से अपना मुंह छुपाते हुए बोली। पहली बार उसने ससुर जी के सामने चोदने जैसे शब्द का इस्तेमाल किया।

"लेकिन उस नालयक ने तुम्हें कभी नंगी करके नहीं चोदा ना?"

"नहीं पिताजी। लेकिन ये सब आप क्यों पूछ रहे हैं?"

"इसलिये बहु कि अब हम तुम्हारी कच्छी उतारके और तुम्हें पूरी तरह नंगी करके चोदेंगे। अब तुम्हें पता चलेगा की जब मर्द औरत को नंगी करके चोदता है तो औरत को कितना मज़ा आता है।"

"हाय राम! पिता जी.. हमें चोद के आपको पाप लगेगा।"

"इस लाजवाब जवानी को चोदने से अगर पाप लगता है तो लगे। अरे बहु अपने जिस्म की आवाज़ सुनो। अपनी चूत की आवाज़ सुनो। बताओ अगर तुम्हारी चूत को इस लंड की ज़रूरत नहीं है तो उसने हमारे लंड को गीला क्यों कर दिया है?"

"आप अपने गधे जैसे उसको हमारे वहां रगड़ेंगे तो हमारी चूत गीली नहीं होगी क्या?"

"अब इतना गीला कर ही दिया है तो उसे अपनी प्यारी खूबसूरत सी चूत का रस भी पी लेने दो।"

लोहा गरम था। रामलाल ने अब देर करना ठीक नहीं समझा। बस एक बार किसी तरह बहु की चूत में लंड फंसा ले, फिर सब ठीक हो जाएगा। उसने एक झटके में बहु की चूत के रस में सनी हुई पैंटी पकड़ के नीचे खिसका दी। अब कन्चन बिल्कुल नंगी थी।

रामलाल ने बहु को अपनी बाहों में जकड़ लिया और अपने होंठ बहु के रसीले होंठों पे रख दिये। कन्चन भी ससुर जी से लिपटी हुई थी। उसकी चूत बुरी तरह गिली थी। चूत के रस में सनी पैंटी उसके पैरों में पड़ी हुई थी। कन्चन ने पैरों पे उचक के रामलाल के तने हुए लंड को अपनी टांगों के बीच में इस तरह स्थापित किया कि वो उसकी चूत पे ठीक से रगड़ सके। रामलाल बहु की चूत की गर्मी अपने लौड़े पर और कन्चन ससुर जी के विशाल लंड की गर्मी अपनी चूत पे महसूस कर रही थी। काफ़ी देर बहु के होंठों का रसपान करने के बाद रामलाल कन्चन से अलग हो गया और थोड़ी दूर से उसकी मस्त जवानी को निहारने लगा। क्या बला की खूबसूरत थी बहु। गोरी गोरी मांसल चूचिआं। पतली कमर और उसके नीचे फैलते हुए विशाल चूतड़। तराशी हुई मांसल जांघों के बीच में घने काले बाल। रामलाल ने आज तक किसी औरत की चूत पे इतने घने और लम्बे बाल नहीं देखे थे। ऐसी जवानी देख के रामलाल मदहोश हो गया।

"ऊफ.. पिता जी अपनी बहु को नंगी करते आपको ज़रा भी शरम नहीं आई। अब ऐसे घूर घूर के क्या देख रहे हैं?"कन्चन शर्मा कर एक हाथ से अपनी चूत और एक हाथ से अपनी चूचिओं को ढकने की नाकामयाब कोशिश करती हुई बोली।

"सच बहु आज तक हमनें इतनी मस्त जवानी नहीं देखी। इस बेचारे लंड को निराश ना करो, थोड़ा सा तो अपनी चूत का रस पिला दो। चलो अगर तुम हमें नहीं देना चाहती हो तो कोई बात नहीं, हम सिर्फ़ लंड का सुपाड़ा तुम्हारी चूत में डाल के निकाल लेंगे। बेचारा थोड़ा सा पानी पी लेगा। अब तो ठीक है ना?"

"ठीक है पिताजी। हमें चोदेंगे तो नहीं ना?" कन्चन जान के चोदने जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रही थी। उसके मुंह से ये सुन के रामलाल और भी पागल हुआ जा रहा था।

"नहीं चोदेंगे बहु। तुम्हारी इज़ाज़त के बिना तुम्हें कैसे चोद सकते हैं।"

ये कहते हुए रामलाल ने नंगी कन्चन को अपनी बलिश्ठ बाहों में उठा लिया और बिस्तर पे पटक दिया। अब वो पागलों की तरह बहु के पूरे बदन को चूमने लगा। फिर उसने बहु की मोटी जांघें फैला दी। बहु के जांघों के बीच का नज़ारा देख के उसका कलेजा मुंह को आ गया। घनी लम्बी झांटों के बीच में से बहु की चूत के खुले हुए होंठ झांक रहे थे मानों बर्सों से प्यासे हों। नंगी कन्चन अपने ससुर के सामने टांगें फैलाये पड़ी हुई थी। शर्म के मारे उसने दोनों हाथों से अपना मुंह ढक लिया।

"ऐसे क्या देख रहे हैं पिताजी...?"

"हमें भी तो इस जन्नत का नज़ारा देखने दो बहु। बहु तुमने तो टांगों के बीच में पूरा जंगल उगा रखा है। कभी साफ़ नहीं किया? इतनी खूबसूरत चूत को यों घने बालों के पीछे क्यों छुपा रखा है?"

"इसलिये कि कहीं आपकी नज़र ना लग जाए।"

"आए हाय! बहु तुम्हारी इसी अदा ने तो हमें मार डाला है।"

अब रामलाल से ना रहा गया। उसने बहु की मादक चूत को आगे झुक के चूम लिया। धीरे धीरे वो उसकी चूत चाटने लगा। कन्चन के मुंह से अब सिसकारियां निकल रही थी।

इस्स्स..आअआआआअह....इइइइइस्स्स्स्स....उउंहह। रामलाल की जीभ बहु की चूत के अन्दर बाहर हो रही थी। ऊऊप्फ....आआआह....पिताआआजी...आह...आइइइइई। बहु की चूत बुरी तरह रस छोड़ रही थी। उसकी लम्बी लम्बी झांटें भी भीग गयी थी। बहु वासना की आग में उत्तेजित हो के, चूतड़ उचका उचका के अपनी चूत ससुर जी के मुंह पे रगड़ रही थी। रामलाल का पूरा मुंह बहु की चूत के रस में सन गया। चूत के बाल रामलाल के मुंह में जा रहे थे। अब बहु को चोदने का टाईम आ गया था। रामलाल ने बहु के टांगें मोड़ के उसकी छाती से लगा दी। बहु की चूत उभर आयी थी और मुंह फाड़े लंड का इन्तज़ार कर रही थी। रामलाल ने अपने फौलादी लंड का सुपाड़ा बहु की खुली हुई चूत के मुंह पे टिका दिया और धीरे धीरे दोनों फांकों के बीच में रगड़ने लगा। कन्चन से अब और सहन नहीं हो रहा था।

"इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स.... पिताजी क्यों तंग कर रहे हैं? आपका वो तो हमारी उसका रस पीना चाहता है ना। अब डाल भी दीजिये अन्दर"। कन्चन का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। जिस लंड के वो रात दिन सपने देखती थी अब उसका मोटा सुपाड़ा कन्चन की चूत के दरवाज़े पे दस्तक दे रहा था।

"बहु तुम्हारी चूत तो बिल्कुल डबल रोटी की तरह फूली हुई है।"

"आपको अच्छी लगी?"

"बहुत।"

"तो फिर ले लीजिये ना..अब डालिये ना प्लीज़..." कन्चन अपने चूतड़ उचका के लंड अपनी चूत में लेने की कोशिश करते हुए बोली। रामलाल ने लंड के सुपाड़े को बहु की चूत की दोनों फांकों के बीच के कटाव में थोड़ा और रगड़ा और फिर हल्का सा धक्का लगा दिया। चूत इतनी गीली थी कि लंड का मोटा सुपाड़ा गुप्प से अन्दर घुस गया।

"आऐइइइई.......आआह पिता जी.....आआह......आअआपका तो बहुत.....आआ मोटाआआआआ है। मैं मर जाउंगी।"

"कुछ नही होगा बहु।" रामलाल ने बहु की चूचिआं मसलते हुए इस बार एक करारा सा धक्का लगा के एक चौथाई लंड अन्दर कर दिया।

"ऊई...माआं...आआअह....आआआइइइइइइई इइइइइइइइइइइइइई........ आआहहहह। पिताजी आप तो आह... हमें चोद रहे हैं। इस्स्स्स..."

"अच्छा नहीं लग रहा तो निकाल लें बहु।"

"बहुत अच्छा लग रहा है...आअआह.......ऊऊह....आपने तो कहा था की आप चोदेंगे नहीं।"

"कहां चोद रहें हैं बहु? इसे सिर्फ़ तुम्हारी चूत का रस पिला दें। बिना चूत में जाए ये रस कैसे पियेगा?"

रामलाल ने लंड को सुपाड़े तक बाहर खींचा और फिर एक ज़बर्दस्त धक्का लगा दिया। इस बार करीब ८ इन्च लंड बहु की चूत में समा गया। कन्चन का दर्द के मारे बुरा हाल था।

"आआआआआआआआआ.................प्लीईईईईईईईईईईज....आआआह. आह.आह...आह ।आह आपका तो बहुत लम्बा है पिताजी। आइइअआह..... हम नहीं झेल पाएंगे। अआ.....आह.....अभी और कितना बाकी है? आह।"

"बस बहु अब तो बहुत थोड़ा सा ही बाहर है।"

"जी हमारी तो फट जाएगी।"

"नहीं फटेगी बहु। तुम तो ऐसे कर रही हो जैसे ज़िन्दगी में पहली बार लंड तुम्हारी चूत में गया हो।"

"जी मर्द का तो कई बार गया है...आआआह......... लेकिन गधे का तो आज पहली बार जा रहा है....मम्मी...आआआआह"

"बस बहु थोड़ा सा और झेल लो। उसके बाद तो हम निकाल ही लेंगे।"

यह कह कर रामलाल ने बहु की चूत के रस में सना हुआ लंड पूरा बाहर खींच लिया और उसकी मोटी मोटी चूचिआं पकड़ के एक बहुत ही ज़ोर का धक्का लगा दिया। इस बार रामलाल का ११ इन्च का मूसल बहु की चूत को बड़ी बेरहमी से चीरता हुआ पूरा जड़ तक अन्दर समा गया। रामलाल के सांड जैसे बड़े बड़े टट्टे बहु के ऊपर की ओर उठे हुए विशाल चूतड़ों से चिपक गये और गांड के छेद में गुद गुदी करने लगे।

"आआआइइइइइइइई......आअह...आअह... पिताजीईईईई........इस्स्स्स्स......मर गयी मैं.. ऊह, सचमुच फट जाएगी हमारी। प्लीज़ हमें छोड़ दीजिये। आपका तो किसी गधी के लिये ही ठीक है।"

"मेरी जान, अब इतना क्यों चिल्ला रही हो? तुम्हारी चूत ने तो हमारा पूरा लंड खा लिया है।"

"जी इतनी बेरहमी से आपने अन्दर जो पेल दिया। इइइस्स्स्स्स्स्स्स...."

रामलाल ने हल्के हल्के धक्के लगाने शुरु कर दिये। कन्चन बिल्कुल मस्त हो गयी थी।

"आआअह्ह्ह... इस्स्स्स्स.....उआआआह....पिताजी...आअह आप तो हमें सचमुच ही चोदने लग गये।"

"कहो तो ना चोदें बहु।"

"सच आप बहुत ही खराब हैं। औरत को फुसला के चोदना तो कोई आपसे सीखे। अपना गधे जैसा वो पूरा हमारे अन्दर पेल दिया, और अब कह रहे हैं, कहो तो ना चोदें। इसे चोदना नहीं तो और क्या कहते हैं?"

"तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा बहु?" रामलाल आधा लंड बाहर निकाल के फिर जड़ तक पेलता हुआ बोला।

"आआई...इस्स्स्स। जी बहुत अच्छा लग रहा है। काश आप हमारे ससुर ना होते ! तो हम आज जी भर के आपसे चुदवाते॥"

"देखो बहु तुम्हें मज़ा आ रहा है और हमने भी ऐसी जवान और खूबसूरत औरत को कभी नहीं चोदा। सिर्फ़ आज चोद लेने दो।"

"सच आप बहुत चालाक हैं। अभी थोड़ी देर पहले आपने हमें बेटी कहा था, औरा अब अपनी बेटी को ही चोद रहे हैं? बोलिये अब भी हम आपकी बेटी हैं ? "

"हां बेटी , तुम अब भी हमारी बेटी हो और हमेशा हमारी बेटी रहोगी।" रामलाल एक ज़ोर का धक्का मारता हुआ बोला।

"आआआह। ।अच्छाआआआ जी! अपनी बेटी को चोदते हुए आपको ज़रा भी शरम नही आ रही? लेकिन पिताजी आपका बहुत मोटा है। हमारी उसको चौड़ी कर देगा। चौड़ी हो गयी तो इन्हें पता लग जाएगा। हम कहीं के नहीं रहेंगे।"

"किसको चौड़ी कर देगा बहु?"

"हटिये भी आपको पता तो है। हमारी जिस चीज़ में ये मूसल घुसा हुआ है उसी को तो चौड़ी करेगा ना।" कन्चन रामलाल के लौड़े को अपनी चूत से दबाती हुई बोली।

"कितनी नादान हो बहु, इतनी जल्दी थोड़े ही चौड़ी हो जाती है। अगर हम तुम्हें दो तीन साल चोदें तो शायद चौड़ी हो जाए।"

"फिर ठीक है, अब तो आपने चोदना शुरु कर ही दिया है तो आज चोद लीजिये। लेकिन आज के बाद फिर कभी नहीं चोदने देंगे। ये पाप है। इन्होनें पूछा चौड़ी कैसे हो गयी तो कह देंगे खेत में जाते वक्त एक गधे ने हमें ज़बर्दस्ती चोद दिया। वैसे ये बात झूठ तो है नहीं। इस वक्त हमें एक गधा ही तो चोद रहा है। "

"सच बहु तुम बातें बहुत मीठी मीठी करती हो॥ आज तो जी भर के चोद लेने दो। ऐसी चूत चोद के तो हम धन्य हो जाएंगे। लेकिन बहु तुम्हें चुदाई सिखाना भी हमारा धर्म है। बोलो सीखोगी न?"

"जी, आप सिखाइये, हम ज़रूर सिखेंगे।"

"देखो बहु चुदवाते वक्त औरत को कोई शरम नहीं करानी चाहिये। बस खुल के रंडी की तरह चुदवाओ।"

"हुमें क्या पता रंडिआं कैसे चुदवाती हैं।"

"बहु रंडिआं चुदवाते वक्त कोई शरम नहीं करती और ना ही अपनी जुबान पे काबू रखती हैं। रंडी सिर्फ़ एक औरत की तरह चुदवाती हई, मर्द से पूरा मज़ा लेती है और मर्द को पूरा मज़ा देती है। बोलो बहु चोदें तुम्हें रंडी की तरह?"

"आअआ...जी, चोदिये हमें बिल्कुल रंडी बना के चोदिये। इइइइइस्स्स्स्स.... आज ये चूत आपकी है।" कन्चन ने अब शर्माने का नाटक बन्द कर दिया और बेशर्मी के साथ चोदने की बातें करने लगी।

"शबाश बहु! ये हुई ना बात, आज हम तुम्हारी चूत की प्यास बुझा के ही दम लेंगे। तब तक चोदेंगे जब तक तुम्हारा दिल नहीं भर जाता।"

"जी हम कब मना कर रहे हैं। चोदिये ना।"कन्चन चूतड़ उचकाती हुई बोली अब रामलाल बहु के नंगे बदन को और मांसल जांघों को सहलाने लगा। धीरे धीरे कन्चन का दर्द दूर होता जा रहा था और उसकी चूत ने फिर से पानी छोड़ना शुरु कर दिया था। रामलाल बहु के रसीले होंठों को चूसने लगा और धीरे धीरे अपना लंड बहु की चूत के अन्दर बाहर करने लगा। कन्चन को अब बहुत मज़ा आ रहा था। गधे जैसे लंड से चुदवाने में औरत को कैसा आनंद मिलता है आज उसे पता चला। रामलाल के मोटे लौड़े ने कन्चन की चूत बुरी तरह चौड़ी कर रखी थी।

"दर्द हो रहा हो तो बाहर निकाल लें बहु?"

"नहीं नहीं पिता जी हमारी चिन्ता ना किजिये बस हमें इतना चोदिये कि आपके लंड की बर्सों की प्यास शान्त हो जाए। आपके लंड की प्यास शान्त हो जाए तो हमें बहुत खुशी होगी।" कन्चन चूतड़ उचका के रामलाल का लौड़ा गुप्प से अपनी चूत में लेती हुई बोली। रामलाल ने बहु की टांगों को और चौड़ा किया और हल्के हल्के धक्के लगने लगा। वो नहीं चाहता था की उसका मूसल बहु की नाज़ुक चूत को फाड़ दे। एक बार बहु की चूत को उसके लम्बे मोटे लौड़े को झेलने की आदत पर जाए फिर तो वो खूब जम के चोदेगा। कन्चन ने ससुरजी की कमर में टांगें लपेट ली और अपने पैर की एड़िओं से उनके चूतड़ को धक्का देने लगी। रामलाल समझ गया की बहु की चूत अब चुदाई के लिये पूरी तरह तैयार है। अब उसने बहु की चूचिआं पकड़ के लंड को सुपाड़े तक बाहर निकाल के जड़ तक अन्दर पेलना शुरु कर दिया। बहु की चूत इतनी ज़्यादा गीली थी की पूरे कमरे में बहु की चूत से फच...फच...फच...फच...फच...फच...फच....फच.....और मुंह से आअआह... इइस्स्स्स..... आऐइइई.... आआह्ह्ह्ह.... आआआअआ.... उइइइइइइई.. आह्ह्ह.... आह.... आह.... आह.... आह का मादक संगीत निकल रहा था।

"बहु ये फच....फच.... की आवाज़ें कहां से आ रही हैं?" रामलाल बहु को चिढ़ाता हुआ बोला।

"इस्स....अआह....पिताजी ये तो अपने मूसल से पूछिये।"

"उस बेचारे को क्या पता बहु?"

"उसे नहीं तो किसे पता होगा पिताजी। इस्स्स....ज़ालिम कितनी बेरहमी से हमारी चूत को मार रहा है।"

"तुम्हारी चूत भी तो बहुत ज़ालिम है बहु। कितने दिनों से हमारी नींद हराम कर रखी थी। ऐसी चूत को चोदने में रहम कैसा? सच इसे तो आज हम फाड़ डालेंगे।" रामलाल ज़ोर ज़ोर से धक्के मारता हुआ बोला।

"हाय ! पिताजी, हमने कब कहा रहम कीजिये। औरत की चूत के साथ ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक ही बार रहम किया जाता है और वो भी अगर चूत कुंवारी हो। उसके बाद अगर रहम किया तो फिर चूत दूसरा लंड ढुंढने लगती है। औरत की चूत तो बेरहमी से ही चोदी जाती है। अगर हमारी चूत ने आपको इतना तंग किया है तो फाड़ डालिये ना इसे। कौन रोक रहा है?"

कन्चन तो अब बिल्कुल रंडिओं की तरह बातें कर रही थी और हर धक्के का जबाब अपने चूतड़ ऊपर उचका के दे रही थी। अब तो ससुर और बहु के अंगों का मिलन हवा में हो रहा था। ससुर जी के धक्के से आधा लंड बहु की चूत में जाता और बहु के धक्के से बाकी बचा हुआ लंड जड़ तक बहु की प्यासी चूत में घुस जाता। कन्चन ने शर्म हया बिल्कुल छोड़ दी थी और खुल के चुदवा रही थी। फच.... फच....फच.... फच.... अआ....आआह। ..इइइइस्स्स्स.........ऊऊइइइमआं ...फच...फच....... बहु की चूत से इतना रस निकल रहा था कि उसकी घनी झांटें भी चूत के रस से चिपचिपा गयी थी। ससुर जी का मूसल जब जड़ तक बहु रानी की चूत में जाता और जब बहु और ससुर की झांटों का मिलन हो जाता तो ससुर जी की झांटें भी बहु की चूत के रस में गीली हो जाती। अब रामलाल पूरा ११ इन्च का लंड बाहर निकाल कर जड़ तक बहु की चूत में पेल रहा था। कन्चन ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इस उम्र में भी ससुर जी का लंड अपने दोनों बेटों से ज़्यादा तगड़ा और सख्त होगा और उसकी जवान चूत की ये हालत कर देगा। उसकी चूत के चारों तरफ़ चूत के रस में सनी झांटों का जंगल तो मानो एक दलदल बन गया था। कन्चन समझ गयी की ससुर जी चुदाई की कला में बहुत माहिर थे। हों भी क्यों ना। ना जाने कितनी लड़किओं को चोद चुके थे। अब कन्चन से रहा नहीं गया और उसने ससुर जी से पूछ ही लिया,

"आआहह......इस्स्स......आ....पिता जी, सच सच बताइये, आज तक आपने कितनी लड़किओं को चोदा है?"

"क्यों बहु तुम ये क्यों पूछ रही हो?" रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को सहलाता हुआ बोला।

"आप जिस तरह हमें चोद रहे हैं वैसे तो कोई काम कला में माहिर आदमी ही चोद सकता है। और अगर आपने ज़िन्दगी में सिर्फ़ सासु मां को ही चोदा होता तो आप काम कला में इतने माहिर नहीं हो सकते थे।"

"क्यों बहुत मज़ा आ रहा है बहु?"

"जी बहुत! आज तक किसी मर्द ने हमें ऐसे नहीं चोदा।"

"कितने मर्दों से चुदवा चुकी हो बहु?"

"धत! आप तो बड़े वो हैं पिताजी। बताइये ना प्लीज़। कितनी औरतों को चोद चुके हैं?"

रामलाल बहु के रसीले होंठों को चूमता हुआ बोला, "देखो बहु, तुम्हारी सासु मां तो अपनी चूत देती नहीं थी। हमारी जवानी भी वैसे ही बर्बाद हो रही थी जैसे तुम्हारी जवानी बर्बाद हो रही है। हमें लाचार हो कर अपने बदन की प्यास बुझाने के लिये खेतों में काम करने वाली औरतों का सहारा लेना पड़ा।"

"हाय....तो आपने खेतों में काम करने वाली औरतों को चोदा? कितनों को चोदा?" कन्चन ज़ोर से चूतड़ उचका के ससुर जी का लंड अपनी चूत में पेलते हुए बोली।

"ये ही कोई बीस औरतों को।"

"हाय राम! बीस को! उनमें से कुन्वारी कितनी थी?"

"बहु लड़की कुन्वारी हो तो इसका मतलब ये नहीं की उसकी चूत भी कुन्वारी है।"

"जी हमारा मतलब है उनमे से कितनों की चूत कुन्वारी थी।"

"तीन की।"

"सच, फाड़ ही डाली होगी आपके इस मूसल ने।"

"नहीं बहु ऐसा नहीं है। तुम्हारी सासु मां की जो हालत हुई थी उसके बाद से हम बहुत सम्भल गये थे। लेकिन फिर भी बहुत खून खराबा हो गया था। बेचारी थी भी १७ या १८ साल की। इतना ध्यान से चोदने के बाद भी तीनों ही बेहोश हो गयी थी।"

"उसके बाद से तो उन्होनें आपसे कभी नहीं चुदवायी होगी।"

"नहीं बहु उनमें से एक ही ऐसी थी जिसे हमने अगले चार साल तक खूब चोदा।"

"कौन थी वो पिताजी?" कन्चन जानते हुए भी अन्जान बन रही थी।

"देखो बहु ये राज़ हम आज सिर्फ़ तुम ही को बता रहे हैं। वो हमारी साली यानी तुम्हारी सासु मां की सगी बहन थी।"

"हाय राम! पिताजी आपने अपनी साली तक को नहीं छोड़ा? चार साल में तो चौड़ी हो गयी होगी उसकी चूत।" कन्चन अपनी चूत से रामलाल का लंड दबाते हुए बोली।

"उसे तो सिर्फ़ चार साल चोदा था बहु, लेकिन अगर तुम चाहोगी तो हम तुम्हें ज़िन्दगी भर चोद सकते हैं। अपनी जवानी बर्बाद ना करो"

"बर्बाद क्यों होगी हमारी जवानी। अब आपके हवाले जो कर दी है। ज़िन्दगी भर चोद के तो आप का ये गधे जैसा मूसल हमारी चूत को कुआं बना देगा।" कन्चन बेशर्मी से चूतड़ उचकती हुई बोली। ससुर जी को बहु को चोदते अब करीब एक घन्टा हो चला था। कन्चन के पसीने छूत गये थे लेकिन रामलाल झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।

अचानक रामलाल बहु की चूत से लंड बाहर निकालता हुआ बोला, "बहु अब हम तुम्हें एक दूसरी मुद्रा में चोदेंगे।"

"वो कैसे पिताजी?"कन्चन रामलाल के मोटे, काले, चूत के रस में चमकते हुए लंड का भयन्कर रूप देख के कांप उठी।

"तुमने कुत्ते और कुतिआ को तो चुदाई करते देखा है?"

"जी..."

"बुस कुतिआ बन जाओ। हम तुम्हारी चूत कुत्ते की तरह पीछे से चोदेंगे।"

"हाय राम! पिता जी...! अपनी बहु को पहले रंडी और अब कुतिआ भी बन डाला।"

"कभी कुतिआ बन के चुदवाई हो बहु?"

"इन्होनें तो हमें औरत की तरह भी नहीं चोदा, कुतिआ बनाना तो दूर की बात है। लेकिन आज हम आपकी कुतिआ ज़रूर बनेंगे।" ये कह कर कन्चन कुतिआ बन गयी। उसने अपनी छाती बिस्तर पे टिका दी और घुटनों के बल हो कर टांगें चौड़ी कर ली और बड़े ही मादक ढंग से अपने विशाल चूतड़ों को ऊपर की ओर उचका दिया। इस मुद्रा में बहु के विशाल चूतड़ों और मांसल जांघों के बीच में से घनी झांटों के बीच बहु की फूली हुई चूत साफ़ नज़र आ रही थी। रामलाल के मोटे लंड की चुदाई के कारण चूत का मुंह खुल गया था और बहुत ही सूजी हुई सी लग रही थी। बहु के गोरे गोरे मोटे मोटे चूतड़ और उनके बीच से झांकता गुलाबी छेद देख कर तो रामलाल के मुंह में पानी आ गया। रामलाल से ना रहा गया। उसने अपने मूसल का सुपाड़ा बहु की चूत के खुले हुए मुंह पे टिका दिया और एक ज़बर्दस्त धक्का लगा दिया। चूत इतनी गीली थी कि एक ही धक्के में ११ इन्च लम्बा लंड जड़ तक बहु की चूत में समा गया।

"आआआआह्ह्ह्ह्ह.....उइइइइइइई माआआआआ...... हाय राम..पिता जी..... मार डाला। इस्स्स्स्स्स्स............कुत्ते भी इतने ही बेरहम होते हैं क्या?"

"हां मेरी जान, तभी तो कुतिआ को मज़ा आता है।"

रामलाल ने अब बहु के चूतड़ पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के मारना शुरु कर दिया था। बहु भी चूतड़ उचका उचका के ससुरजी के धक्कों का जबाब दे रही थी। इस मुद्रा में बहु के मुहं और चूत दोनों ही और भी ज़्यादा आवाज़ कर रहे थे। बहु अपने चूतड़ पीछे की ओर उचका उचका के ससुर जी के लंड का स्वागत कर रही थी। बहु की चूत का रस अब रामलाल के सांड की तरह लटकते टट्टों को पूरी तरह गीला कर चुका था। कन्चन अब तक दो बार झड़ चुकी थी लेकिन रामलाल झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।

कन्चन ने अपने चूतड़ ज़ोर से पीछे की ओर उचका के रामलाल का मूसल जड़ तक अपनी चूत में पेलते हुए पूछा, "पिताजी आप हमें कुतिआ बना के चोद रहे हैं, कहीं चुदाई के बाद कुत्ते की तरह आपका लंड हमारी चूत में तो नहीं फंसा रह जाएगा?"

"फंसा रह भी गया तो क्या हो जाएगा बहु?"

"हमें तो कुछ नहीं पिताजी, लेकिन जब सासु मां शाम को वापस आके आपको हमारे ऊपर कुत्ते की तरह चढ़ा हुआ देखेंगी और आपका मूसल हमारी चूत में फंसा हुआ देखेंगी तो आपके पास क्या जवाब होगा?"

"कह देंगे की एक कुत्ता तुम्हारी बहु को चोदने की कोशिश कर रहा था। इससे पहले की वो तुम्हारी बहु की चूत में अपना लंड पेलता, उस कुत्ते से बचाने के लिये हमें अपना लंड बहु की चूत में पेलना पड़ा। आखिर जो कुछ किया बहु को बचाने के लिये ही तो किया।"

"अच्छा जी! और अगर वो पूछें की बहु नंगी कैसे हो गयी तो?"

"तो क्या? कह देंगे बहु नहाने जा रही थी कि एक बहुत बड़ा कुत्ता बहु को नंगी देख के खिड़की से खूद के अन्दर आ गया और उसे गिरा के उसके ऊपर चढ़ कर चोदने की कोशिश करने लगा।"

"और वो पूछें की आपको अपना लंड हमारी चूत में पेलने की क्या ज़रूरत थी, तो?"

"अरे भई ये तो बहुत सिम्पल बात है। अगर बहु की चूत में लंड पेल के हमने बहु का छेद बन्द ना किया होता तो वो कुत्ता उस छेद में अपना लंड पेल देता। हमने तो सिर्फ़ अपने घर की इज़्ज़त बचा ली।"

"हां... आपके पास तो सब चीज़ों का जबाब है।" कन्चन अपने चूतड़ उचका के रामलाल का पूरा लंड अपनी चूत में लेती हुई बोली।

अब रामलाल ने कन्चन के चूतड़ पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के मारना शुरु कर दिया। उसने बहु के गोरे गोरे चूतड़ों को दोनों हाथों में पकड़ के फैला दिया था ताकि उनके बीच में गुलाबी रंग के छोटे से छेद के दर्शन कर सके। आखिर बहु के इन विशाल चूतड़ों ने ही तो उसकी नींद हराम कर रखी थी। बहु का गुलाबी छेद देख कर उसके मुहं में पानी आ रहा था। उसका मन कर रहा था की नीचे झुक के उस गुलाबी छेद को चूम ले। रामलाल जानता था कि यहां बहु की गांड मारना खतरे से खाली नहीं था। बहु का चिल्लाना सुन के पूरा मुहल्ला जमा हो सकता था। अगर उसका मूसल नहीं झेल पायी और बेहोश हो गयी तुब तो और भी मुसीबत हो जाएगी। लेकिन उसने सोच लिया था कि वो बहु को खेतों में ले जा के उसकी गांड ज़रूर मारेगा।

उधर कन्चन बड़ी अच्छी तरह समझ रही थी कि जिस तरह ससुर जी ने उसके चूतड़ों को फैला रखा था, उन्हें उसकी गांड के दर्शन हो रहे होंगे। उसके सेक्सी चूतड़ों को देख के मर्द के दिल में क्या होता है वो भी वो अच्छी तरह जानती थी। वो मन ही मन सोच रही थी कि ससुर जी कभी ना कभी तो उसकी गांड ज़रूर मारेंगे। इतना मोटा और लम्बा मूसल तो उसकी गांड फाड़ ही डालेगा। रामलाल से अब और नहीं रहा गया। उसने अपना ११ इन्च का लंड बहु की चूत से बाहर खींच लिया और नीचे झुक के अपना मुंह बहु के फैले हुए विशाल चूतड़ों के बीच में दे दिया। रामलाल पागलों की तरह बहु की गांड के गुलाबी छेद को चाटने लगा और अपनी जीभ कभी कभी छेद के अन्दर घुसेड़ देता।

"इस्स्स्स.........आआआह.......आआअहहहह.........इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स पिता जी ये आप क्या कर रहे हैं? वहां तो गंदा होता है।"

"चुदाई के खेल में कुछ गंदा नहीं होता । तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा बहु?"

"जी अच्छा तो बहुत लग रहा है, लेकिन...."

"लेकिन क्या? मज़ा तो आ रहा है ना? सच तुम्हारी गांड बहुत ही स्वादिष्ट है।"

"हटिये भी पिताजी, वो कैसे स्वादिष्ट हो सकती है? वहां से तो..."

"हमें पता है बहु वहां से तुम क्या करती हो। आज तक इस छेद से तुमने सिर्फ़ बाहर निकालने का काम किया है, कुछ अन्दर नहीं लिया।"

"हाय राम! उस छेद से अन्दर क्या लिया जाता है?"

"बहु जब ये लंड तुम्हारे पीछे वाले छेद में जाएगा तुब देखना कितना मज़ा आएगा।"

"हाय राम! पीछे वाले छेद में भी लंड डाला जाता है क्या?" कन्चन बनती हुई बोली।

"हां बहु, औरत के तीन छेद होते हैं और तीनों ही चोदे जाते हैं। औरत की सिर्फ़ चूत ही नहीं गांड भी मारी जाती है। औरत को मर्द का लंड भी चूसना चहिये। जिस औरत के तीनों छेदों में मर्द का लंड ना गया हो वो अपनी जवानी का सिर्फ़ आधा ही मज़ा ले पाती है।"

"बाप रे ! ये गधे जैसा लंड उस छोटे से छेद में कैसे जा सकता है? सच ये तो हमारे छेद को फाड़ ही डालेगा। ना बाबा ना हमें नहीं लेना ऐसा मज़ा।"

"अरे बहु इतना घबराती क्यों हो? हम तो सिर्फ़ तुम्हारे इस गुलाबी छेद को प्यार कर रहे हैं, तुम्हारी गांड तो नहीं मार रहे।"

"आअहह बहुत मज़ा आ रहा है। आअह...आआइइइइई... जीभ अन्दर डाल दीजिये, प्लीज़....."

रामलाल बड़ी तेज़ी से अपनी जीभ बहु की गांड के अन्दर बाहर कर रहा था और उस गुलाबी छेद के चारों ओर चाट रहा था। कन्चन अब और नहीं सह पायी और एक बार फिर झड़ गयी।

"पिता जी हम तो अब तक तीन बार झड़ चुके हैं और आप हैं की झड़ने का नाम ही नहीं ले रहे। अब प्लीज़ हमें चोदिये और हमारी प्यासी चूत को अपने वीर्य से भर दीजिये।"

"ठीक है बहु जैसा तुम चाहो। आज पहले तुम्हारी प्यासी चूत को तृप्त कर दें। बाद में तो तुम्हें काम कला के कई गुर सिखाने हैं।"

"ठीक है गुरु जी! अब तो प्लीज़ हमारी चूत चोदिये और इसकी बरसों की प्यास बुझा दीजिये। हम कहीं भाग तो रहे नहीं, रोज़ आप से चुदाई के नये नये तरीके सीखेंगे।"

रामलाल ने बहु की गांड में से अपनी जीभ निकाली और फिर से अपने लंड का सुपाड़ा कुतिआ बनी बहु की फूली हुई चूत पे टिका दिया और एक ही धक्के में फच की आवाज़ के साथ जड़ तक पेल दिया। अब रामलाल बहु के दोनों चूतड़ों को पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। करीब बीस मिनट तक बहु की चूत की अपने मूसल से पिटाई करने के बाद बरसों से अपने बाल्स में इकट्ठा किया हुआ वीर्य बहु की चूत में उड़ेल दिया। बहु को तो जैसे नशा सा आ रहा था। उसकी चूत ससुर जी के गरमा गरम वीर्य से लबालब भरी गयी थी और अब तो वीर्य चूत में से निकल कर बिस्तर पे भी टपक रहा था। रामलाल ने बहु की चूत में से अपना मूसल बाहर खींचा और बहु के बगल में लेट गया। बहु भी निढाल हो के बिस्तर पे लुढ़क गयी थी। तीन घन्टे से चल रही इस भयन्कर चुदाई से उसके अंग अंग में मीठा मीठा दर्द हो रहा था।

रामलाल ने बहु से पूछा, "बहु, कुछ शान्ति मिली?"

"जी, आज तो तृप्त हो गयी।"

"चलो उठो, तुम्हारी सासु मां के आने का टाईम हो रहा है। नहा धो लो, कहीं उन्हें शक ना हो जाए।"

"जी ठीक है।"

कन्चन बिस्तर से उठी और गिरते गिरते बची। वीर्य उसकी चूत से निकल के जांघों पे बह रहा था। उसकी टांगें कांप रही थी। रामलाल ने जल्दी से उठ के बहु को सहारा दिया। बहु तो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। रामलाल बहु को ले के बाथरूम में गया और उसे एक स्टूल पे बैठा दिया। उसके बाद उसने बहु की टांगें फैला दी और पानी से चूत की सफ़ाई करने लगा। बहु की घनी झांटें ससुर के वीर्य में सनी हुई थी। कन्चन को अपनी सुहाग रात याद आ गयी जब इसी तरह उसके पति ने उसकी चूत की सफ़ाई की थी। आज वही काम ससुर जी कर रहे थे। फर्क सिर्फ़ इतना था कि सुहाग रात को उसकी कुंवारी चूत की दुर्दशा हुई थी और आज ससुर जी के मूसल ने उसकी कई बार चुदी हुई चूत की भी वैसी ही दुर्दशा कर दी जैसी सुहाग रात को हुई थी। चूत साफ़ करने के बाद ससुरजी ने कन्चन के ऊपर पानी डाल के उसे नहलाना शुरु कर दिया। ठन्डा ठन्डा पानी पड़ने से कन्चन के शरीर में जान आई। कन्चन ने भी ससुर जी के लंड को पानी से साफ़ किया जो उसकी चूत के रस में बुरी तरह सना हुआ था। इस तरह बहु और ससुर ने एक दूसरे को नहलाया।

रामलाल ने उसके बाद कन्चन को कहा, "बहु जाओ सासु मां के आने से पहले थोड़ा आराम कर लो।"

"ठीक है पिता जी।" कन्चन अपने कमरे में चली गयी। बिस्तर में लेटते ही उसकी आंख लग गयी। तीन घन्टे की चुदाई से वो बहुत थक गयी थी। सासु मां के आने से पहले वो करीब एक घंटा घोड़े बेच के सोयी।

समाप्त

कंचन : बेटी बहन भाभी से बहू तक का सफ़र - 29

इस घटना के बाद ना जाने रामलाल ने बहु की चूत की याद में कितनी बार मुठ मारी। सिर्फ़ एक बार बहु की चूत लेने के लिये तो वो जान भी देने को तैयार था। लेकिन क्या करता बेचारा। रिश्ता ही कुछ ऐसा था। रामलाल की दीवानगी बढ़ती जा रही थी। कन्चन रामलाल के दिल की हालत अच्छी तरह जानती थी। आखिर मर्दों को तड़पाने का खेल तो वो बचपन से खेल रही थी। एक रात की बात है। सासु मां अपने कमरे में सो रही थी और रामलाल भी अपने कमरे में लाईट बन्द करके सोने की कोशिश कर रहा था। इतने में उसे कुछ आवाज़ आई। कमरे से बाहर झांका तो देखा कि बहु बाथरूम की ओर जा रही थी। बहु ने नाईटी पहन रखी थी और नाईटी के बारीक कपड़े में से उसकी मांसल टांगों की झलक मिल रही थी। रामलाल समझ गया कि बहु पेशाब करने जा रही थी। बहु की चूत से निकलते पेशाब के मादक संगीत की कल्पना से ही रामलाल का लंड खड़ा होने लगा। कन्चन बाथरूम में गयी लेकिन सबको सोया समझ कर उसने बाथरूम का दरवाज़ा अन्दर से बन्द नहीं किया। थोड़ी देर में ’प्स्स्स्स्स्स्स...........’ का मधुर संगीत रामलाल के कानों में पड़ने लगा।

अचानक ज़ोर से बहु के चिल्लाने की आवाज़ आई। "आअआ आआअआ आआअआ इइइइई इइइइइइइइइई इइइइइइइइइइइइ" रामलाल घबड़ा के बाथरुम में भागा। उसने देखा बहु बुरी तरह घबड़ायी हुई थी। उसके चेहरे पे हवाईयां उड़ रही थी। बहुत ही अच्छा मौका था। रामलाल ने मौके का पूरा फायदा उठाते हुए बहु को खींच के सीने से लगा लिया। कन्चन तो बुरी तरह घबड़ायी हुई थी। वो भी रामलाल के बदन से चिपक गयी।

रामलाल कन्चन की पीठ सहलता हुआ बोला, "क्या हुआ बहु?"

"ज्ज्ज्जी... स्स्सांप। सांप" कन्चन नाली की ओर इशारा करते हुए बोली।

"वहां तो कुछ नहीं है।" रामलाल बहु की पीठ सहलता हुआ बोला। बहु ने ब्रा नहीं पहनी हुई थी।

"नहीं पिता जी नाली में से काले रंग का एक लम्बा मोटा सांप निकला था। शायद नाग था।"

"कैसे निकला बहु? तुम क्या कर रही थी?" रामलाल का हाथ बहु की पीठ से फिसल कर उसके मोटे मोटे चूतड़ों पे आ गया।

"हम वहां नाली पे बैठ के पेशाब कर रहे थे कि अचानक वो मोटा काला नाग निकल आया। हे राम कितना डरावना था। हमारी तो जान ही निकल गयी।"

बहु को दिलासा देने के बहाने रामलाल उसके विशाल चूतड़ों को सहलाने लगा। अचानक उसे एहसास हुआ कि बहु ने कच्छी भी नहीं पहनी हुई थी। नाईटी के अन्दर से बहु की नंगी जवानी रामलाल के बदन को गरमा रही थी।

"अरे बहु तुमने आज अन्दर से ब्रा और कच्छी नहीं पहनी है?" कन्चन को भी अचानक एहसास हुआ कि वो ससुर जी से चिपकी हुई है और ससुर जी काफ़ी देर से उसकी पीठ और चूतड़ों को सहला रहे हैं।

वो शर्माती हुई बोली, "जी सारा दिन बदन कसा रहता है ना, इसलिये रात को सोने से पहले हम ब्रा और कच्छी को उतार के सोते हैं।"

"तुम ठीक करती हो बहु। सारा दिन तो तुम्हारी जवानी ब्रा और कच्छी में कसी रहती है। रात में तो उसे आज़ादी चाहिये।" नाली के पास ही एक बाल्टी में बहु की ब्रा और कच्छी धोने के लिये पड़ी हुई थी। रामलाल उनकी ओर इशारा करते हुए बोला, "वही हैं ना तुम्हारे कपड़े?"

"जी।"

"हुम.... अब समझा ये नाग यहां क्यों आया था।" रामलाल बहु की कच्छी उठता हुआ बोला।

"क्यों आया था पिताजी ?" कन्चन रामलाल के हाथ में अपनी उतारी हुई पैंटी देख के बुरी तरह शर्मा गयी। रामलाल बहु के सामने ही उसकी पैंटी को सूंघता हुआ बोला।

"अरे बहु इस कच्छी में से तुम्हारे बदन की खुश्बू आ रही है। उस काले नाग को तुम्हारे बदन की ये खुश्बू पसन्द आ गयी होगी। जब तुम पेशाब करने के लिये पैर फैला के बैठी तो वही खुश्बू नाग को फिर से आई। इसिलिये वो एकदम से बाहर निकल आया।" रामलाल बहु के मादक चूतड़ों को सहलाता हुआ बोला।

"ठीक है पिताजी आगे से हम अपने कपड़े बाथरूम में नहीं रखेंगे।"

"हां बहु ये तो शुक्र करो नाग ने तुम्हें टांगों के बीच में नहीं काट लिया, नहीं तो बेचारे राकेश का क्या होता?" रामलाल बहु के चूतड़ दबाता हुआ बोला।

"हाय! पिताजी आप तो बहुत खराब हैं। हम ऐसे ही थोड़े ही काटने देते।"

"तो फिर कैसे काटने देती बहु?"रामलाल को कच्छी में चिपके हुए बहु की झांटों के दो बाल नज़र आ गये।

"ये बाल तुम्हारे हैं बहु?"

कन्चन का चेहरा सुर्ख लाल हो गया। वो हकलाती हुई बोली, "ज्ज्ज्जी"

"बहुत लम्बे हैं। हम तो तुम्हारे सिर के बाल देख कर ही समझ गये थे कि बाकी जगह के बाल भी खूब लम्बे होंगे।" अब तो कन्चन का रामलाल से आंख मिला पाना मुश्किल हो रहा था। ससुर जी की बाहों से अपने आप को छुड़ा के बोली, "म्म्म्म। पिताजी हमें बहुत नींद आ रही है अब हम सोने जा रहे हैं।" कन्चन जल्दी से अपने कमरे में भाग गयी। वो सोच रही थी कि आज दूसरी बार ससुर जी ने मौके का पूरा फायदा उठाया और वो कुछ ना कर सकी।

उधर रामलाल अपने बिस्तर पे करवट बदल रहा था। वो बहु के सोने का इन्तज़ार कर रहा था ताकि बाथरूम में जा के उसकी कच्छी को सूंघ के उसकी मादक चूत की महक ले सके। जैसे ही कन्चन के कमरे की लाईट बन्द हुई रामलाल बाथरूम की ओर चल पड़ा। बाथरूम में घुस कर बहु की कच्छी को सूंघते सूंघते उसका लंड बुरी तरह खड़ा हो गया। रामलाल बहु की नाज़ुक कच्छी को अपने लंड के सुपाड़े पे रख के रगड़ने लगा। काफ़ी देर तक रगड़ने के बाद वो झड़ गया और उसके लंड ने ढेर सारा वीर्य बहु की कच्छी में उड़ेल दिया। रामलाल कच्छी को वहीं धोने के कपड़ों में डाल कर वापिस अपने कमरे में आ कर सो गया। अगले दिन जब कन्चन ने धोने के लिये अपनी पैंटी उठाई तो वीर्य के दाग लगे हुए देख कर समझ गयी कि ससुर जी ने रात को अपना लंड उसकी पैंटी पे रगड़ा है। अब तो कन्चन के मन में ससुर जी के इरादों के बारे में कोई शक नहीं रह गया था। लेकिन वो जानती थी की शायद ससुर जी पहल नहीं करेंगे। उन्हें बढ़ावा देना पड़ेगा। अब तो वो भी ससुर जी के लंड के दर्शन करने के लिये तड़प रही थी।

जब से रामलाल को पता लगा था की बहु रात को सोते वक्त ब्रा और पैंटी उतार के सोती है तब से वो इस चक्कर में रहता था की किसी तरह बहु के नंगे बदन के दर्शन हो जाएं। इसी चक्कर में रामलाल एक दिन सवेरे जल्दी उठ कर बहु को चाय देने के बहाने उसके कमरे में घुस गया। कन्चन बेखबर घोड़े बेच कर सो रही थी। वो पेट के बल पड़ी हुई थी और उसकी नाईटी जांघों तक उठी हुई थी। बहु की गोरी गोरी मोटी मांसल जांघें देख के रामलाल का लंड फनफनाने लगा। उसका दिल कर रहा था कि नाईटी को ऊपर खिस्का के बहु के विशाल मादक चूतड़ों के दर्शन कर ले, लेकिन इतनी हिम्मत नहीं जुटा पया।

रामलाल ने चाय टेबल पे रखी और फिर बहु के विशाल चूतड़ों को हिलाते हुए बोला, "बहु उठो, चाय पी लो।"

कन्चन हड़बड़ा के उठी। गहरी नींद से इस तरह हड़बड़ा के उठ कर बैठते हुए कन्चन की नाईटी बिल्कुल ही ऊपर तक सरक गयी और इससे पहले कि वो अपनी नाईटी ठीक करे, एक सेकेंड के लिये रामलाल को कन्चन की गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच में से घने बालों से ढकी हुई चूत की एक झलक मिल गयी।

"अरे पिताजी आप?"

"हां बहु हमने सोचा रोज़ बहु हमें चाय पिलाती है तो आज क्यों ना हम बहु को चाय पिलाएं।"

"पिताजी आपने क्यों तकलीफ़ की। हम उठ के चाय बना लेते।" मन ही मन कन्चन जानती थी ससुर जी ने इतनी तकलीफ़ क्यों की। पता नहीं ससुर जी कितनी देर से उसकी जवानी का अपनी आंखों से रसपान कर रहे थे।

"अरे इसमें तकलीफ़ की क्या बात है। तुम चाय पी लो।" ये कह कर रामलाल चला गया।

कन्चन ने नोटिस किया की ससुर जी का लंड खड़ा हुआ था जिसको छुपाते हुए वो बाहर चले गये। कन्चन के दिमाग में एक प्लान आया। वो देखना चाहती थी की अगर ससुर जी को इस तरह का मौका मिल जाए तो वो किस हद तक जा सकते हैं। उस रात कन्चन ने सिर दर्द का बहाना किया और ससुर जी से सिर दर्द की दवा मांगी।

"पिता जी हमारे सिर में बहुत दर्द हो रहा है। सिर दर्द और नींद की गोली भी दे दीजिये।"

"हां बहु सिर दर्द के साथ तुम दो नींद की दो गोली ले लो ताकि रात में परेशानी ना हो।" कन्चन समझ गयी की ससुरजी नींद की दो गोली खाने के लिये क्यों कह रहे हैं। उसका प्लान सफ़ल होता नज़र आ रहा था। उसे पूरा विश्वास था की आज रात ससुर जी उसके कमरे में ज़रूर आएंगे। रात को सोने से पहले ससुर जी ने अपने हाथों से कन्चन को सिर दर्द और नींद की दो गोलिआं दी।

कन्चन गोलिआं ले कर अपने कमरे में आयी और गोलिओं को तो बाथरूम में फैंक दिया। ससुर जी को यह दिखाने के लिये कि वो सिर दर्द से बहुत परेशान और थकी हुई हई, कन्चन ने साड़ी उतार के पास पड़ी कुर्सी पे फैंक दी। फिर उसने अपनी पैंटी और ब्रा उतारी और बिस्तर के पास ज़मीन पर फैंक दी। ब्लाउज के सामने वाले तीन हुक्स में से दो हुक खोल दिये। अब तो उसकी बड़ी बड़ी चूचिआं ब्लाउज में सिर्फ़ एक ही हुक के कारण कैद थी। कन्चन का आज नाईटी के बजाये ब्लाउज और पेटिकोट में ही सोने का इरादा था ताकी ससुर जी को ऐसा लगे कि सिर दर्द और नींद के कारण उसने नाईटी भी नहीं पहनी। आज तो उसने अपने कमरे के बाहर की लाईट भी बन्द नहीं की ताकी थोड़ी रौशनी अन्दर आती रहे और ससुर जी उसकी जवानी को देख सकें। पूरी तयारी करके कन्चन ने अपने बाल भी खोल लिये और बिस्तर पर बहुत मादक ढंग से लेट गयी। वो पेट के बल लेटी हुई थी और उसने पेटिकोट इतना ऊपर चढ़ा लिया कि अब वो उसके चूतड़ों से दो इंच ही नीचे था। कन्चन की गोरी गोरी मांसल जांघें और टांगें पूरी तरह से नंगी थी।

ससुर जी के स्वागत की पूरी तैयारी हो चुकी थी। रात भी काफ़ी हो चुकी थी और कन्चन बड़ी बेसब्री से ससुर जी के आने का इन्त्ज़ार कर रही थी। वो सोच रही थी की ससुर जी उसको गहरी नींद में समझ कर क्या क्या करेंगे। रात को करीब एक बजे के आस पास कन्चन को अपने कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। उसकी सांसें तेज़ हो गयी। थोड़ा थोड़ा डर भी लग रहा था।

ससुर जी दबे पाओं कमरे में घुसे और सामने का नज़ारा देख के उनका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। बहु इतनी थकी हुई और नींद में थी कि उसने नाईटी तक नहीं पहनी। पेट के बल पड़ी हुई बहु के चूतड़ों का उभार बहुत ही जान लेवा था। बाहर से आती हुई भीनी भीनी रोशनी में जांघों तक उठा हुआ पेटिकोट बहु की नंगी टांगों को बहुत ही मादक बना रहा था। बहु ऐसे टांगें फैला के पड़ी हुई थी कि थोड़ा सा पेटिकोट और ऊपर सरक जाता तो बहु की लाजवाब चूत के दर्शन हो जाते जिसकी झलक रामलाल पहले भी देख चुका था। आज मौका था जी भर के बहु की चूत के दर्शन करने का। रामलाल मन ही मन मना रहा था कि कहीं बहु कच्छी पहन के ना सो गयी हो। तभी उसकी नज़र बिस्तर के पास ज़मीन पे पड़ी हुई कच्छी और ब्रा पे पड़ गयी। रामलाल का लंड बुरी तरह से खड़ा हो गया था। रामलाल सोच रहा था कि बेचारी बहु इतनी नींद में थी कि कच्छी और ब्रा भी ज़मीन पे ही फेंक दिये। अब तो उसे यकीन था कि बहु पेटिकोट और ब्लाउज के नीचे बिकुल नंगी थी। सारा दिन ब्रा और कच्छी में कसी हुई जवानी को बहु ने रात को आज़ाद कर दिया था। और आज रात रामलाल बहु की आज़ाद जवानी के दर्शन करने का इरादा कर के आया था। फिर भी वो यकीन करना चाहता था की बहु गहरी नींद में सो रही है।

फिर भी वो यकीन करना चाहता था की बहु गहरी नींद में सो रही है।

उसने कन्चन को धीरे से पुकारा, "बहु! बहु! सो गयी क्या?"

कोई जबाब नहीं। अब रामलाल ने धीरे से कन्चन को हिलाया। अब भी बहु ने कोई हरकत नहीं की। रामलाल को यकीन हो गया कि नींद की गोली ने अपना काम कर दिया है। कन्चन आंखें बन्द किये पड़ी हुई थी। अब रामलाल की हिम्मत बढ़ गयी। वो बहु की कच्छी को उठा के सूघने लगा। बहु की कच्छी की गन्ध ने उसे मदहोश कर दिया। सारा दिन पहनी हुई कच्छी में चूत, पेशाब और शायद बहु की चूत के रस की मिली जुली खुश्बू थी। लौड़ा बुरी तरह से फनफनया हुआ था। रामलाल ने बहु की कच्छी को जी भर के चूमा और उसकी मादक गन्ध का आनंद लिया। अब रामलाल पेट के बल पड़ी हुई बहु के पैरों की तरफ़ आ गया। बहु की अल्हड़ जवानी अब उसके सामने थी। रामलाल ने धीरे धीरे बहु के पेटिकोट को ऊपर की ओर सरकना शुरु कर दिया। थोड़ी ही देर में पेटिकोट बहु की कमर तक ऊपर उठ चुका था। सामने का नज़ारा देख के रामलाल की आंखें फटी रह गयी। बहु कमर से नीचे बिल्कुल नंगी थी। आज तक उसने इतना खूबसूरत नज़ारा नहीं देखा था।

बहु के गोरे गोरे मोटे मोटे फैले हुए चूतड़ बाहर से आती हुई हल्की रोशनी में बहुत ही जान लेवा लग रहे थे। रामलाल अपनी ज़िन्दगी में कई औरतों को चोद चुका था लेकिन आज तक इतने सैक्सी नितम्ब किसी भी औरत के नहीं थे। रामलाल मन ही मन सोचने लगा की अगर ऐसी औरत उसे मिल जाए तो वो ज़िन्दगी भर उसकी गांड ही मारता रहे। लेकिन ऐसी किस्मत उसकी कहां? आज तक उसने किसी औरत की गांड नहीं मारी थी। मारने की तो बहुत कोशिश की थी लेकिन उसके गधे जैसे लंड को देख कर किसी औरत की हिम्मत ही नहीं हुई। पता नहीं बेटा बहु की गांड मारता है कि नहीं। उधर कन्चन का भी बुरा हाल था। उसने खेल तो शुरु कर दिया लेकिन अब उसे बहुत शरम आ रही थी और थोड़ा डर भी लग रहा था॥ हालांकि एक बार पहले वो ससुर जी को अपने नंगे बदन के दर्शन करा चुकी थी लेकिन उस वक्त ससुर जी बहुत दूर थे। आज तो ससुर जी अपने हाथों से उसे नंगी कर रहे थे। फैली हुई टांगों के बीच से चूत के घने बालों की झलक मिल रही थी। रामलाल ने बहुत ही हल्के से बहु के नंगे चूतड़ों पे हाथ फेरना शुरु कर दिया। कन्चन के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी। रामलाल ने हल्के से एक उंगली कन्चन के चूतड़ों की दरार में फेर दी। लेकिन कन्चन जिस मुद्रा में लेटी हुई थी उस मुद्रा में उसकी गांड का छेद दोनों चूतड़ों के बीच बन्द था। आखिर कन्चन एक औरत थी।

एक मर्द का हाथ उसके नंगे चूतड़ों को सहला रहा था। अब उसकी चूत भी गीली होने लगी। अभी तक कन्चन अपनी दोनों टांगें सीधी लेकिन थोड़ी चौड़ी करके पेट के बल लेटी हुई थी॥ ससुर जी को अपनी चूत की झलक और अच्छी तरह देने के लिये अब उसने एक टांग मोड़ के ऊपर कर ली। ऐसा करने से अब कन्चन की चूत उसकी टांगों के बीच में से साफ़ नज़र आने लगी। बिल्कुल साफ़ तो नहीं कहेंगे, लेकिन जितनी साफ़ उस भीनी भीनी रोशनी में नज़र आ सकती थी उतनी साफ़ नज़र आ रही थी। गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच घनी और लम्बी लम्बी झांटों से ढकी बहु की खूब फूली हुई चूत देख के रामलाल की लार टपकने लगी। हालांकि गांड का छेद अब भी नज़र नहीं आ रहा था। रामलाल ने नीचे झुक के अपना मुंह बहु की जांघों के बीच डाल दिया। बहु की झांटों के बाल उसकी नाक और होंठों को छू रहे थे। अब कुत्ते की तरह वो बहु की चूत सूघंने लगा। कन्चन की चूत काफ़ी गीली हो चुकी थी और अब उसमें से बहुत मादक खुश्बू आ रही थी। आज तक तो रामलाल बहु की पैंटी सूंघ कर ही काम चला रहा था लेकिन आज उसे पता चला की बहु की चूत की गन्ध में क्या जादू है। रामलाल को ये भी अच्छी तरह समझ आ गया कोई कुत्ता कुतिआ को चोदने से पहले उसकी चूत क्यों सूंघता है।

रामलाल ने हिम्मत करके हल्के से बहु की चूत को चूम लिया। कन्चन इस के लिये तैयार नहीं थी। जैसे ही रामलाल के होंठ उसकी चूत पे लगे वो हड़बड़ा गयी। रामलाल झट से चारपायी के नीचे छुप गया। कन्चन अब सीधी हो कर पीठ के बल लेट गयी लेकिन अपना पेटिकोट जो कि कमर तक उठ चुका था नीचे करने की कोई कोशिश नहीं की। रामलाल को लगा की बहु फिर सो गयी है तो वो फिर चारपायी के नीचे से बाहर निकला। बाहर निकल के जो नज़ारा उसके सामने था उसे देख के वो दंग रह गया। बहु अब पीठ के बल पड़ी हुई थी। पेटिकोट पेट तक ऊपर था ओर उसकी चूत बिल्कुल नंगी थी। रामलाल बहु की चूत देखता ही रहा गया। घने काले लम्बे लम्बे बालों से बहु की चूत पूरी तरह ढकी हुई थी। बाल उसकी नाभी से करीब तीन इन्च नीचे से ही शुरु हो जाते थे। रामलाल ने आज तक किसी औरत की चूत पे इतने लम्बे और घने बाल नहीं देखे थे। पूरा जंगल उगा रखा था बहु ने। ऐसा लग रहा था मानो ये घने बाल बुरी नज़रों से बहु की चूत की रक्षा कर रहे हों। अब रामलाल की हिम्मत नहीं हुई की वो बहु की चूत को सहला सके क्युंकि बहु पीठ के बल पड़ी हुई थी और अब अगर उसकी आंख खुली तो वो रामलाल को देख लेगी। बहु के होंठ थोड़े थोड़े खुले हुए थे। रामलाल बहु के उन गुलाबी होंठों को चूसना चाहता था लेकिन ऐसा कर पाना मुश्किल था। फिर अचानक रामलाल के दिमाग में एक प्लान आया। उसने बहु का पेटिकोट धीरे से नीचे करके उसकी नंगी चूत को ढक दिया। अब उसने अपना फनफनाता हुआ लौड़ा अपनी धोती से बाहर निकाला और धीरे से बहु के खुले हुए गुलाबी होंठों के बीच टिका दिया।

कन्चन को एक सेकेन्ड के लिये समझ नहीं आया की उसकी होंठों के बीच ये गरम गरम ससुर जी ने क्या रख दिया लेकिन अगले ही पल वो समझ गयी की उसके होंठों के बीच ससुर जी का तना हुआ लौड़ा है। मर्द के लंड का टेस्ट वो अच्छी तरह पहचानती थी। अपने देवर का लंड वो ना जाने कितनी बार चूस चुकी थी। वो एक बार फिर हड़बड़ा गयी लेकिन इस बार बहुत कोशिश करके वो बिना हिले आंखें बन्द किये पड़ी रही। ससुर जी के लंड के सुपाड़े से निकले हुए रस ने कन्चन के होंठों को गीला कर दिया। कन्चन के होंठ थोड़े और खुल गये। रामलाल ने देखा की बहु अब भी गहरी नींद में है तो उसकी हिम्मत और बढ़ गयी। बहु के होंठों की गर्मी से उसका लंड बहु के मुंह में घुसने को उतावला हो रहा था। रामलाल ने बहुत धीरे से बहु के होंठों पे अपने लंड का दबाव बढ़ाना शुरु किया। लेकिन लंड तो बहुत मोटा था। मुंह में लेने के लिये कन्चन को पूरा मुंह खोलना पड़ता। रामलाल ने अब अपना लंड बहु के होंठों पे रगड़ना शुरु कर दिया और साथ में उसके मुंह में भी घुसेड़ने की कोशिश करने लगा। रामलाल के लंड का सुपाड़ा बहु के थूक से गीला हो चुका था। कन्चन की चूत बुरी तरह गीली हो गयी थी। उसका अपने ऊपर कन्ट्रोल टूट रहा था। उसका दिल कर रहा था की मुंह खोल के ससुर जी के लंड का सुपाड़ा मुंह में लेले। अब नाटक खत्म करने का वक्त आ गया था।

कन्चन ने ऐसा नाटक किया जैसे उसकी नींद खुल रही हो। रामलाल तो इस के लिये तैयार था ही। उसने झट से लंड धोती में कर लिया। बहु का पेटिकोट तो पहले ही ठीक कर दिया था। कन्चन ने धीरे धीरे आंखें खोली और ससुर जी को देख कर हड़बड़ा के उठ के बैठने का नाटक किया। वो घबराते हुए अपने अस्त व्यस्त कपड़े ठीक करते हुए बोली, "पिताजी...अआप? यहां क्या कर रहे हैं?"

"घबराओ नहीं बेटी, हम तो देखने आए थे कि कहीं तुम्हारी तबियत और ज़्यादा तो खराब नहीं हो गयी। कैसा लग रहा है?" रामलाल बहु के माथे पे हाथ रखता हुआ बोला जैसे सचमुच बहु का बुखार चैक कर रहा हो।

कन्चन के ब्लाउज के तीन हुक खुले हुए थे। वो अपनी चूचिओं को ढकते हुए बोली,"जी। मैं अब बिल्कुल ठीक हूं। नींद की गोलिआं खा के अच्छी नींद आ गयी थी। लेकिन आप इतनी रात को...?"

"हां बेटी, बहु की तबियत खराब हो तो हमें नींद कैसे आती। सोचा देख लें तुम ठीक से सो तो रही हो।"

"सच पिता जी आप कितने अच्छे हैं। हम तो बहुत भाग्यशाली हैं जिसे इतने अच्छे सास और ससुर मिले।"

"ऐसा ना कहो बहु। तुम रोज़ हमारी इतनी सेवा करती हो तो क्या हम एक दिन भी तुम्हारी सेवा नहीं कर सकते? हमारी अपनी बेटी होती तो क्या हम ये सब नहीं करते" रामलाल प्यार से बहु की पीठ सहलाते हुए बोला। कन्चन मन ही मन हंसते हुए सोचने लगी, अपनी बेटी को भी आधी रात को नंगी करके उसके मुंह में लंड पेल देते?

"पिताजी हम बिल्कुल ठीक हैं। आप सो जाइये।"

"अच्छा बहु हम चलते हैं। आज तो तुमने कपड़े भी नहीं बदले। बहुत थक गयी होगी।"

"जी सिर में बहुत दर्द हो रहा था।"

"हम समझते हैं बहु। अरे ये क्या? तुम्हारी कच्छी और ब्रा नीचे ज़मीन पे पड़ी हुई है।" रामलाल ऐसे बोला जैसे उसकी नज़र बहु की कच्छी और ब्रा पर अभी पड़ी हो। रामलाल ने बहु की कच्छी और ब्रा उठा ली।

"जी हमें दे दीजिये।" कन्चन शर्माते हुए बोली।

"तुम आराम करो हम धोने डाल देंगे। लेकिन ऐसे अपनी कच्छी मत फ़ेंका करो। वो काला नाग सूंघता हुआ आ जाएगा तो क्या होगा? उस दिन तो तुम बच गयी नहीं तो टांगों के बीच में ज़रूर काट लेता।"

कन्चन ने मन ही मन कहा वो काला नाग काटे या ना काटे लेकिन ससुर जी की टांगों के बीच का काला नाग ज़रूर किसी दिन काट लेगा। रामलाल बहु की कच्छी और ब्रा ले के चला गया। कन्चन अच्छी तरह जानती थी कि उसकी कच्छी का क्या हाल होने वाला है। रामलाल बहु की कच्छी अपने कमरे में ले गया और उसकी मादक खुश्बू सूंघ के अपने लंड के सुपाड़े पे रख के रगड़ने लगा। हमेशा की तरह ढेर सारा वीर्य बहु की कच्छी में उड़ेल दिया और लंड कच्छी से पोंछ के उसे धोने में डाल दिया। कच्छी की दास्तान कन्चन को अगले दिन कपड़े धोते समय पता लग गयी।

कंचन : बेटी बहन भाभी से बहू तक का सफ़र - 28

"लेकिन सासु मां के साथ ससुर जी ने ऐसा धोखा क्यों किया?"

"बहु रानी जब औरत अपने पति की प्यास नहीं बुझा पाती है तो उसे मजबूर हो कर दूसरी औरतों की ओर देखना पड़ता है। आपकी सासु मां धार्मिक स्वभाव की है। उसे चुदाई में कोई दिलचस्पी नहीं है। बेचारे बाबू जी क्या करते?"

"धार्मिक स्वभाव का ये मतलब थोड़े ही होता है की अपने पति की ज़रूरत का ध्यान ना रखा जाए।"

"वोही तो मैं भी कह रही हूं बहु रानी। मर्द लोग तो उसी औरत के गुलाम हो जाते हैं जो बिस्तर में बिल्कुल रंडी बन जाए।"

कमला अब कन्चन की चूत और उसके चारों ओर के घने बालों की मालिश कर रही थी। कन्चन की चूत बुरी तरह गीली हो गयी थी। थोड़ी देर इस तरह मालिश करने के बाद बोली, "चलो बहु रानी अब सीधी हो के पीठ पे लेट जाओ।"

कन्चन सीधी हो कर पीठ पे लेट गयी। उसके बदन पे एक भी कपड़ा नहीं था। बिल्कुल नंगी थी, लेकिन अब वो इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की उसे किसी बात की परवाह नहीं थी। जैसे ही कन्चन पीठ पे लेटी कमला तो उसके बदन को देखती ही रह गयी। क्या गदराया हुआ बदन था। बड़ी बड़ी चूचिआं छाती के दोनों ओर झूल रही थी। कन्चन की झांटें देख कर तो कमला चौंक गयी। नाभी से थोड़ा नीचे से ही घने काले काले बाल शुरु हो जाते थे। कमला ने आज तक कभी इतनी घनी और लम्बी झांटें नहीं देखी थी। चूत तो पूरी तरह से ढकी हुई थी।

"हाय राम! बहु रानी ये क्या जंगल उगा रखा है? आप क्यों अपनी चूत ढकने की कोशिश कर रही थी? इन घने बालों में से तो कुछ भी नज़र नहीं आता है।" ये कहते हुए कमला ने ढेर सारा तेल कन्चन की झांटों पे डाल दिया और दोनों हाथों से झांटों की मालिश करने लगी।

"आह.....आआहहह ऊऊइइइइइ इइइस्स्स्स्स्स्स।"

"बहु रानी आप अपनी झांटों में कभी तेल नहीं लगाती?"

"हट पागल, वहां भी कोई तेल लगाता है क्या.... आइइइई ?"

"बहु रानी जैसे सिर के बाल औरत की खूबसूरती बढ़ाते हैं, वैसे ही झांटें औरत की चूत की खूबसूरती पे चार चान्द लगा देती हैं। चूत के ऊपर सूखे सूखे बाल तो किसी मर्द को नहीं रिझा सकते। जितना ध्यान आप अपने बालों का रखती हो उतना ही ध्यान अपनी झांटों का भी रखना चाहिये। अब तो कन्चन ने टांगें खूब चौड़ी कर रखी थी मानो चुदवाने के लिये लेटी हो। कमला, कन्चन की चूत को ज़ोर ज़ोर से मसल के मालिश कर रही थी। कन्चन की चूत के रस से उसकी झांटें गीली हो रही थी।

"सच कमला तू तो बहुत अच्छी मालिश करती है। आआआह.... बहुत मज़ा आ रहा है। लेकिन एक बात बता, मर्दों को औरत की झांटें क्यों इतनी अच्छी लगती हैं?"

"बहु रानी औरत की चूत के बाल ही उसकी चूत की खुश्बू को समेते रहते हैं। आपने देखा नहीं कुत्ता कैसे कुतिआ की चूत की गन्ध सून्घ कर उसके पीछे पीछे घूमता रहता है? लेकिन आपकी चूत पे बाल इतने घने और लम्बे हैं की आपकी चूत तो नज़र आती ही नहीं"।

"कमला, तू मेरी चूत देख कर क्या करेगी?" कन्चन हंसती हुई बोली।

"अरे बहु रानी मैं तो नहीं लेकिन आपके पति देव तो देखेंगे। मर्द को औरत की झांटें तो अच्छी लगती हैं लेकिन उसे चूत की फांके, उसके बीच का कताव और चूत का छेद तो नज़र आना चाहिये। मर्द को औरत की चूत के अन्दर बाहर होता हुआ अपना लंड देखने में बहुत मज़ा आता है। लाओ मैं आपकी झांटें इस तरह से काट देती हूं की आपकी चूत नज़र आने लगे। फिर देखना आपके पति आप पे कैसे फिदा रहते हैं।"

"हाय राम ! कमला तू मेरे साथ क्या क्या कर रही है?" कमला ने पास पड़ी कैंची उठा ली और कन्चन की टांगें चौड़ी करके उसकी चूत के बाल काटने लगी। अब कन्चन की चूत की दोनों फांके, चूत का कटाव और उसके बीच का गुलाबी छेद साफ़ नज़र आने लगा। कमला उसकी फूली हुई चूत देख कर दंग रह गयी। उसने और ढेर सारा तेल कन्चन की चूत पे डाल दिया और उसकी मालिश करने लगी।

"उइइइइइआआह.... इइइइइस्स्स्स.... कमलाआआ क्यों तंग कर रही है ?"

"सच बहु रानी आपकी चूत पे तो मेरा ही दिल आ गया है। सोचिये आपके पति का क्या हाल होग? एक बात पूछूं? बुरा तो नहीं मानोगी?"

"पूछ कमला तेरी बात का का बुरा मैं कभी नहीं मान सकती। इस्स्स....आआअह"

"आपके पति तो आपको रोज़ कम से कम तीन चार बार चोदते होंगे?"

"क्यों तू ये कैसे कह सकती है?"

"आप का बदन है ही इतना गदराया हुआ की कोई भी मर्द रोज़ चोदे बिना नहीं रह सकता।"

"मैं तुझे क्यों बताऊं? पहले तू बता की तूने ससुर जी के लंड की मालिश कैसे शुरु कर दी? और अगर लंड की मालिश करती है तो तुझे उन्होनें चोदा भी ज़रूर होगा?"

"अरे बहु रानी बाबू जी की मालिश तो एक इत्तेफ़ाक है। मैने आपको बताया था ना की मैं बाबुजी के लिये लड़कियां पटा के लाती थी। अक्सर बाबू जी एक दिन में तीन तीन लड़किओं को चोदते थे। ज़रा सोचो, हर लड़की को सिर्फ़ दो बार भी चोदें तब भी उन्हें छः बार चुदाई करानी पड़ती थी। इतनी चुदाई के बाद आदमी थक तो जाता ही है। बाबू जी जानते थे की मैं बहुत अच्छी मालिश करती हूं इसलिये मुझे मालिश के लिये बोल देते थे। एक दिन बाबु जी बोले ’कमला बुरा ना मानो तो वहां भी मालिश कर दो। उस लड़की की बहुत टाईट थी, लंड में दर्द हो रहा है।’। मेरे तो मन की मुराद पूरी हो गयी। मैं चुदने के बाद कई औरतों की हालत देख चुकी थी और उनसे बाबू जी के लंड के बारे में सुन चुकी थी। जब मैनें मालिश करने के लिये उनकी धोती खोली तो बेहोश होते होते बची। सिकुड़ा हुआ लंड भी इतना मोटा और भयंकर लग रहा था। जब मैनें मालिश शुरु की तो लंड धीरे धीरे खड़ा होने लगा। पूरा तन जाने के बाद तो मुझे दोनों हाथों से मालिश करनी पड़ रही थी। बाप रे! मोटा काला, कितना विशाल लंड था। मेरी मालिश से बाबू जी बहुत खुश हुए और उसके बाद से किसी को भी चोदने से पहले मैं उनके लंड की मालिश करके उसे चुदाई के लिये तैयार करने लगी। काश भगवान ने मुझे अच्छा बदन दिया होता और मैं भी बाबू जी को रिझा पाती। दिल तो बहुत करता था की वो गधे जैसा लंड मेरी चूत में भी जाए पर औरत जात हूं ना, बाबू जी ने कभी मुझे चोदने की इच्छा नहीं जताई और मैं उनसे कैसे कहती की मुझे चोदो।"

"बात तो तेरी ठीक है। एक रंडी भी ये नहीं कहती की मुझे चोदो। लेकिन ये बता तूने ससुर जी को चोदते हुए तो ज़रूर देखा होगा।?"

"हां बहु रानी देखा तो है। इसी कमरे के बगल में जो कमरा है वहां से इस कमरे में झांक सकते हैं। जिस चारपायी पे आप लेटी हो उसी चारपायी पे बाबू जी ने अपनी साली को ना जाने कितनी बार चोदा है।"

"सच कमला! कुछ बता ना कैसा लगता था?" अब तो कन्चन की चूत बुरी तरह से गीली हो चुकी थी। ससुर जी के गधे जैसे मोटे काले लंड की कल्पना से ही कन्चन के बदन में आग लग गयी थी।

कमला इस बात को अच्छी तरह जानती थी। आखिर वो भी मंझी हुइ खिलाड़ी थी। कन्चन की चूत को मसलते हुए बोली, "हाय बहु रानी क्या बताऊं। बेचारी १७ साल की कमसिन लड़की थी जब बाबुजी के मूसल ने उसकी कुंवारी चूत को रौंदा था। बिल्कुल नाज़ुक सी चूत थी उसकी जैसे किसी बच्ची की हो। लेकिन चार साल चुदने के बाद क्या फूल गयी थी और चौड़ी हो गयी थी। अब तो जब भी चुदवाने के लिये टांगें चौड़ी करती थी, उसकी चूत का खुला हुआ छेद नज़र आने लगता था मानो चूत मुंह फाड़े लंड को खाने का इन्तज़ार कर रही हो। बहुत ही मज़े ले कर चुदवाती थी। पहली बार तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ की बाबु जी का इतना लम्बा लंड उसकी चूत में जा भी पाएगा। सच बहु रानी साली की चूत में पूरा लंड जाते मैनें इन आखों से देखा है। जब पूरा लंड घुस जाता था तो बाबू जी के सांड के माफ़िक बड़े बड़े टट्टे साली के चूतड़ों से चिपक जाते थे।

"टट्टे क्या होते हैं?"

"अरे मर्द के लंड के नीचे जो लटकते हैं? वहीं तो सड़का बनता है।"

"ओह! समझी।"

"क्या फच.. फच.. फच.. की आवाजें आती थी। हर धक्के के साथ बाबुजी के झूलते हुए टट्टे मानो साली के चूतड़ों पर मार लगाते थे। जब बाबुजी झड़े तो ढेर सारा वीर्य साली की चूत में से बह कर बाहर चारपायी पे गिरने लगा। ऊफ क्या जानलेवा नज़ारा था।"

"हाय! कमला कितनी बार तूने साली की चुदाई देखी?"

"सिर्फ़ दो बार। उसके बाद बाबुजी को पता चल गया। फिर उन्होनें साली को पम्प हाउस में चोदना शुरु कर दिया।"

आज की मालिश ने और कमला की बातों ने कन्चन के बदन में एक अजीब सी आग लगा दी थी। कन्चन की चुदाई हुए अब एक महीने से भी ज़्यादा हो चुका था।

कुछ दिनों बाद कन्चन के पति का फोन आया। ससुर जी ने कन्चन को बताया की राकेश का फोन है। कन्चन ने अपने कमरे में जा कर फोन का रिसीवर उठा लिया। उधर रामलाल ने भी अपने कमरे का रिसीवर नीचे नहीं रखा और बहु और बेटे की बातें सुनने लगा।

राकेश बोल रहा था, "कन्चन मेरी जान ससुराल जा कर तो तुम हमें भूल ही गयी हो। अब तो एक महीना बीत गया है और कितना तड़पाओगी? बहुत याद आ रही है तुम्हारी।"

"अच्छा जी! बड़ी याद आ रही है आपको मेरी। अचानक इतनी याद क्यों आ रही है?"

"खूबसूरत बीवी से एक महीना अलग रहना तो बहुत मुश्किल होता है मेरी जान। सच, सारा दिन खड़ा रहता है तुम्हारी याद में।"

"आपका वो तो पागल है। उसे कहिये एक महीना और इन्तज़ार करे।"

"ऐसे ना कहो मेरी जान एक महीना और इन्तज़ार करना तो बहुत मुश्किल है।"

"तो फिर अभी कैसे काम चल रहा है?"

"अभी तो मैं तुम्हारी पैंटी से ही काम चला रहा हूं।"

"हाय...! आपने फिर मेरी पैंटी ले ली। जिस दिन वहां से चली थी उस दिन सुबह नहाने से पहले पैंटी उतारी थी। सोचा था गावं में जा के धो लूंगी। गंदी ही सुटकेस में रख ली थी। यहां आ के देखा तो पैंटी गायब थी।"

"बड़ी मादक खुश्बू है तुम्हारी पैंटी की। याद है रात को उतावलेपन में जब पहली बार तुम्हें चोदा था तो पैंटी उतारने की भी फुर्सत नहीं थी, बस चूत के ऊपर से पैंटी को साईड में करके ही पेल दिया था तुम्हारी फूली हुई चूत में"

"अच्छी तरह याद है मेरे राजा। अब आप इस पैंटी को भी फाड़ दोगे? अब तक दो पैंटी तो पहले ही फाड़ चुके हो।"

"कन्चन मेरी जान इस बार आओगी तो पैंटी नहीं तुम्हारी चूत ही चोद चोद के फाड़ दुंगा।"

"सच! मैं भी तो यही चाहती हूं।"

"क्या चाहती हो मेरी जान?"

"कि आप मेरी..... हटिये भी! आप बहुत चालाक हैं।"

"बोलो ना मेरी जान फोन पर भी शर्मा रही हो।"

"आप तो बस मेरे मुंह से गन्दी गन्दी बातें सुनना चाहते हैं।"

"हाय! जब चुदवाने में कोई शरम नहीं तो बोलने में कैसी शरम? तुम्हारे मुंह से सुन के शायद मेरे लंड को कुछ शान्ति मिले। बोलो ना मेरी जान तुम भी क्या चाहती हो?"

"ऊफ! आप भी बस। मैं भी तो चाहती हूं की आप मुझे इतना चोदें की मेरी.... मेरी चूत फट जाए। मैं... मेरी चूत अब आपके उसके लिये बहुत तड़प रही है।"

"किसके लिये मेरी जान।"

"आपके ल्ल..लंड के लिये, और किसके लिये।" कन्चन मुस्कुराते हुए बोली।

"सच कन्चन अब और नहीं सहा जाता। मालूम है इस वक्त भी तुम्हारी पैंटी मेरे खड़े हुए लंड पे लटक रही है।"

"हाय राम, मेरी पैंटी की किस्मत भी मेरी चूत की किस्मत से अच्छी है। अगर आपने मुझे पहले ही बुला लिया होता तो इस वक्त आपके लंड पे पैंटी नहीं मेरी चूत होती।"

"कोई बात नहीं, इस बार जब आओगी तो इतना चोदुंगा की तंग आ जाओगी। बोलो मेरी जान जी भर के दोगी ना?"

"हां मेरे राजा आप लेंगे तो क्यों नहीं दूंगी। मैनें तो सिर्फ़ टांगें चौड़ी करनी हैं, बाकी सारा काम तो आप ही ने करना है।"

"ऐसा ना कहो मेरी जान। चूत देने की कला तो कोई तुमसे सीखे।

"अच्छा जी! तो अपनी बीवी को चोदना इतना अच्छा लगता है? वैसे यहां एक औरत कमला है जो मालिश बहुत अच्छी करती है। मेरे पूरे बदन की मालिश करती है। यहां तक की मेरी चूत की भी मालिश कर दी। कहती है ’बहु रानी आपकी चूत की मालिश करके मैं इसे ऐसा बना दूंगी की आपके पति हमेशा आपकी चूत से ही चिपके रहेंगे।’ तो मैंने उससे कहा की मैं भी तो यही चाहती हूं। वर्ना हमारे पति देव को तो हमारी चूत की याद महीने में एक दो बार ही आती है। ठीक कहा ना जी? उसने चूत के बालों पे भी कुछ किया है।"

"क्या किया है मेरी जान बताओ ना।"

"मैं क्यों बताऊं? खुद ही देख लीजियेगा। लेकिन चूत पे से पैंटी साईड में करके पेलने से नहीं पता चलेगा। ये देखने के लिये तो पूरी नंगी करके ही चोदना पड़ेगा।"

"एक बार आ तो जाओ मेरी जान, अब कपड़ों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। हमेशा नंगी ही रखुंगा।"

"हाय! ऐसी बातें ना करिये। मेरी चूत बिल्कुल गीली हो गयी है। आपके पास तो मेरी पैंटी है, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।"

"वहां गावं में किसी को ढूंढ लो।" राजेश मज़ाक करता हुआ बोला।

"छी कैसी बातें करते हैं? वैसे आपके गावं में आदमी कम गधे ज़्यादा नज़र आते हैं। एक दिन तो हद ही हो गयी। मैं खेत में जा अही थी। मेरे आगे आगे एक गधा और गधी चल रहे थे। गधे का लंड खड़ा हुआ था। बाप रे! तीन फ़ूट से भी लम्बा होगा। बिल्कुल ज़मीन पे लगने को हो रहा था। अचानक वो आगे चल रही गधी पे चढ़ गया और पूरा तीन फ़ूट का लंड उसकी चूत में पेल दिया। सच मेरी तो चीख ही निकल गयी। ज़िन्दगी में पहली बार इतना लम्बा लंड किसी के अन्दर जाता देखा।"

"तुम अपना ध्यान रखना मेरी जान। खेतों में अकेली मत जाना। तुम्हारे कातिलाना चूतड़ों को देख के कोई गधा तुम पे ना चढ़ जाए। कहीं तुम्हारी चूत में तीन फ़ुट का लंड पेल दिया तो?" राजेश हंसता हुआ बोला।

"हटिये, आप तो बड़े वो हैं! आपको तो शरम भी नहीं आती। जिस दिन सचमुच किसी गधे ने मेरे अन्दर तीन फ़ुट का लंड पेल दिया ना उस दिन के बाद मेरी चूत इतनी चौड़ी हो जाएगी की आपके काबिल नहीं रह जाएगी। बोलिये मंज़ूर है?"

"अगर तुम्हारी चूत की प्यास गधे के लंड से बुझ जाती है तो मुझे मंज़ूर है। मैं तो तुम्हें खुश और तुम्हारी चूत को तृप्त देखना चाहता हूं।"

"जाईये भी हम आपसे नहीं बोलते।"

"नाराज़ मत हो मेरी जान मैं तो मज़ाक कर रहा था।"

"अच्छा अब फोन रखिये मुझे खाना भी बनना है।"

"ठीक है मेरी जान, दो तीन दिन बाद फिर फोन करुंगा। बाय।"

राजेश ने फोन रख दिया।

राजेश की बातें सुन कर कन्चन की चूत गीली हो गयी थी। वो रिसीवर रखने ही वाली थी की उसे एक और क्लिक की आवाज़ सुनई दी। ज़रूर कोई और भी उनकी बातें सुन रहा था। कन्चन के घर तो एक्सटेन्शन था नहीं। फोन का एक्सटेन्शन तो यहीं ससुराल में था। वो भी ससुर जी के कमरे में। तो क्या ससुर जी उनकी बातें सुन रहे थे? बाप रे, अगर ससुर जी ने उनकी बातें सुन ली तो क्या सोच रहे होंगे? उधर रामलाल बहु के मुंह से ऐसी सैक्सी बातें सुन कर हैरान रह गया। आखिर बहु उतनी भी भोली नहीं थी जितनी शक्ल से लगती थी।

अब रामलाल बहु को छुप छुप के देखने के चक्कर में रहता था। एक रात कन्चन देर तक जाग रही थी। शायद नोवेल पढ़ रही थी। सब लोग सो गये थे। रामलाल की आंखों में नींद कहां? वो बिस्तर पर लेटा करवटें बदल रहा था। तभी उसे बहु के कमरे में हरकत सुनाई दी। रामलाल ध्यान से देखने लगा। बहु के कमरे का दरवाज़ा खुला और वो रामलाल के कमरे के बगल वाले बाथरूम की ओर जा रही थी। बहु के हाथ में कोई सफ़ेद सी चीज़ थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कच्छी हो। बहु ने बाथरूम में घुस के दरवाज़ा बन्द कर लिया। रामलाल जल्दी से दबे पांव उठा और बाथरूम के दरवाज़े से कान लगा कर सुनने लगा। इतने में स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स की आवाज़ आने लगी। बहु पेशाब कर रही थी। बहु के पेशाब के लिये पैर फैला कर बैठने और उसकी चूत के खुले हुए होंठों के बीच से निकलती हुई पेशाब की धार की कल्पना से ही रामलाल का लौड़ा तन गया। जैसे ही बहु के मूतने की आवाज़ बन्द हुई रामलाल जल्दी से अपने कमरे में जा कर लेट गया। इतने में बहु बाथरूम से बाहर आई ओर अपने कमरे की ओर जाने लगी। उसके हाथ में वो सफ़ेद चीज़ अब नहीं थी।

अपने कमरे में जा कर बहु ने दरवाज़ा बन्द कर लिया और लाईट भी बन्द कर दी। शायद सोने जा रही थी। रामलाल फिर से उठा और बाथरूम में गया। उसका अन्दाजा सही निकला। एक कोने में धोने के कपड़ों में बहु की सफ़ेद कच्छी पड़ी हुई थी। रामलाल ने बाथरूम का दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बहु की कच्छी को उठा लिया। अभी तक उस कच्छी में गर्माहट थी। शायद अभी अभी उतारी थी। रामलाल ध्यान से कच्छी को देखने लगा। कच्छी में दो लम्बे काले बाल फंसे हुए थे। कम से कम चार इन्च लम्बे तो थे ही। ये देख कर रामलाल का लंड हरकत करने लगा। बाप रे ये तो बहु की चूत के बाल थे। इसका मतलब बहु की चूत पे खूब लम्बे और घने बाल हैं। कच्छी का जो हिस्सा बहु की चूत पे रगड़ता था वहां गहरे पीले रंग का दाग सा था। शायद बहु की पेशाब और चूत के रस का दाग था। रामलाल ने दोनों बाल निकाल लिये और कच्छी को सूंघने लगा। उफ क्या जानलेवा गन्ध थी। ये तो बहु की चूत की खुश्बू थी। रामलाल औरत की चूत की गन्ध अच्छी तरह पहचानता था। रामलाल ने जी भर के बहु की कच्छी को सून्घा और फिर उस जगह को अपने लौड़े के सुपाड़े पे टिका दिया जहां कुछ देर पहले बहु की चूत थी। रामलाल ने कच्छी को अपने लंड पे खूब रगड़ा। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो बहु की चूत पे अपना लंड रगड़ रहा हो। कच्छी इतने नाज़ुक थी की रामलाल को डर था कहीं उसका मोटा फौलादी लौड़ा बहु की कच्छी ना फाड़ दे। कुछ देर कच्छी को लंड पे रगड़ने और बहु की चूत की कल्पना करके रामलाल अपने को कन्ट्रोल ना कर सका और उसने ढेर सारा वीर्य कच्छी में उड़ेल दिया। फिर उसने कच्छी धोने में डाल दी और वापस अपने कमरे में चला गया।

अगले दिन जब कन्चन अपने कपड़े धोने लगी तो उसे अपनी पैंटी पे दाग नज़र आया। ऐसा दाग तो मर्द के वीर्य का होता है। कन्चन सोच में पड़ गयी कि ये दाग उसकी पैंटी में कैसे आया। घर में तो सिर्फ़ एक ही मर्द था और वो थे ससुर जी। कहीं ससुर जी तो नहीं लेकिन वो उसकी पैंटी के साथ क्या कर रहे थे? कहीं ये उसका वहम तो नहीं था? लेकिन कन्चन को शक होता जा रहा था की ससुर जी उस पर फिदा होते जा रहे हैं। कन्चन के बदन को ऐसे देखते थे जैसे आंखों से ही चोद रहे हों। अब तो बात बात पे कन्चन की पीठ और चूतड़ों पे हाथ फेरने लगे थे। कभी कन्चन की पीठ पे हाथ रख के उसकी ब्रा को फ़ील करते हुए कहते "हमारी बहु रानी बहुत अच्छी है", कभी उसकी पतली कमर में हाथ डाल के कहते "हम बहु के बिना ना जाने क्या करेंगे", कभी कन्चन के चूतड़ों पे हाथ रख कर कहते "जाओ बहु अब आराम कर लो"।

जब से कन्चन ने कमला से ससुर जी के कारनामे सुने थे तुब से वो भी ससुर जी को एक औरत की नज़र से देखने लगी थी। ससुर जी के विशाल लंड के वर्णन ने तो उसकी नींद ही हराम कर दी थी। कन्चन को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे। ससुर जी तो पिता के समान थे। लेकिन कन्चन के बदन को ललचायी नज़रों से देखना, बात बात पे उसके चूतड़ों पे हाथ फेरना, फोन पे चुपके से उसकी बातें सुनना, और अक्सर ऐसी बातें करना जो कोई ससुर अपनी बहु के साथ नहीं करता, और फिर उसकी पैंटी पे वीर्य का वो दाग, इस बात को साफ़ करता था की ससुर जी का दिल उसपे आ गया है। कन्चन के मन में ये बातें चल रही थी की एक रोज़ जब कन्चन सवेरे जल्दी सो के उठ गयी और उसने खिड़की के बाहर झांका तो देखा की ससुर जी आन्गन में खुली हवा में कसरत कर रहे हैं। कन्चन उत्सुक्तावश पर्दे के पीछे से उन्हें देखने लगी। ससुर जी ने सिर्फ़ एक लंगोट पहन रखा था। कन्चन उनका बदन देख कर हैरान रह गयी। ससुर जी लम्बे चौड़े थे। उनका बदन काला और बिल्कुल गठा हुआ था। लेकिन सबसे ज़्यादा हैरान हुई ससुर जी के लंगोट का उभार देख कर। ऐसा लगता था की जो कुछ भी लंगोट के अन्दर कैद था वो खासा बड़ा था।

कन्चन को कमला की बातें याद आने लगी। उसके बदन में चीटियां रेंगने लगी। कन्चन को विश्वास होने लगा की ससुर जी का लंड ज़रूर ही काफ़ी बड़ा होगा क्युंकि उसके पति राकेश का लंड भी ८ इन्च का था और देवर रामु का लंड तो १० इन्च का था। बाप का लंड बड़ा होगा इसिलिये तो बच्चों का भी इतना बड़ा है। और अगर साली पहली चुदाई में बेहोश हो गयी थी तुब तो ज़रूर ही बहुत बड़ा होगा। पहली बार कन्चन के मन में इच्छा जागी की काश वो ससुर जी का लंड देख सकती। कन्चन को ससुराल आए एक महीने से ज़्यादा हो चला था। अब वो रोज़ सुबह जल्दी उठ जाती और पर्दे के पीछे से ससुर जी को कसरत करते देखती। कन्चन मन ही मन कल्पना करती कि ससुर जी का लंड भी गधे के लंड जैसा खासा लम्बा, मोटा और काला होगा। लेकिन क्या देवर रामु के लंड से भी बड़ा होग? आखिर एक मर्द का लंड कितना बड़ा हो सकता है? कन्चन का विचार पक्का होता जा रहा था कि किसी ना किसी दिन तो वो ससुर जी के लंड के दर्शन ज़रूर करेगी।

हालांकी अब कन्चन को विश्वास हो गया था की ससुर जी अपनी जवान बहु पर फ़िदा हो चुके हैं लेकिन फिर भी वो उनकी परीक्षा लेना चाहती थी। पर्दा तो अब भी करती थी लेकिन अब वो ससुर जी के सामने जाने से पहले अपनी चुन्नी से सिर इस प्रकार से ढ़कती की उसकी छाती पूरी तरह खुली रहे। ससुरजी के लिये दूध का ग्लास टेबल पे रखने के लिये इस तरह से झुकती की ससुर जी को उसके ब्लाउज के अन्दर झांकने का पूरा मौका मिल जाए। वो अक्सर चूड़ीदार पहनती थी क्युंकि ससुरजी ने एक दिन उसको कहा था ’बहु चूड़ीदार में तुम बहुत सन्दर लगती हो। सच तुम्हारा ये चूड़ीदार और कुर्ता तो तुम्हारी जवानी में चार चांद लगा देता है।’ ससुर जी के सामने अपने चूतड़ों को कुछ ज़्यादा ही मटका के चलती थी। पर्दा करने का कन्चन को बहुत फायदा था, क्युंकि वो तो चुन्नी के अन्दर से ससुरजी पे क्या बीत रही है देख सकती थी लेकिन ससुर जी उसका चेहरा ठीक से नहीं देख पाते थे।

एक दिन की बात है। कन्चन नहाने जा रही थी, लेकिन बाथरूम का बल्ब खराब हो गया था। कन्चन सिर्फ़ ब्लाउज और पेटिकोट में ही थी। कन्चन ने एक कुर्सी पे चढ़ कर बल्ब बदलने की कोशिश की लेकिन कुर्सी की टांगें हिल रही थी और कन्चन को गिरने का डर था। उसने सास को आवाज़ दी। दो तीन बार पुकारा लेकिन सासु मां शायद पूजा कर रही थी। उसे कन्चन की आवाज़ सुनाई नहीं दी। रामलाल आंगन में अखबार पढ़ रहा था। बहु की आवाज़ सुन कर वो बाथरूम में गया। वहां का नज़ारा देख के तो उसका कलेजा धक रह गया। बहु सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज में कुर्सी पे खड़ी हुई थी और उसके हाथ में बल्ब था। पेटिकोट नाभी से करीब आठ इन्च नीचे बन्धा हुआ था। बहु की गोरी कमर और मांसल पेट पूरा नज़र आ रहा था। कन्चन ससुर जी को सामने देख कर हड़बड़ा गयी और एक हाथ से अपनी छतियों को ढकने की नाकामयाब कोशिश करने लगी।

हकलाती हुई बोली, "पिताजी। आप....!"

"हां बेटी तुम सासु मां को आवाज़ें दे रही थी। वो तो पूजा कर रही है इसलिये मैं ही आ गया। बोलो क्या काम है?" रामलाल कन्चन की जवानी को ललचायी नज़रों से देखता हुआ बोला।

"जी बल्ब खराब हो गया है। लगाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन कुर्सी हिल रही है। सासु मां को बुला रही थी की अगर वो मुझे पकड़ लें तो मैं बल्ब बदल सकूं।" कन्चन का एक हाथ अब भी अपनी छातिओं को छुपाने की कोशिश कर रहा था।

"कोई बात नहीं बहु मैं तुम्हें पकड़ लेता हूं।"

"जी आप?"

"घबराओ नहीं गिराऊंगा नहीं।" ये कहते हुए रामलाल ने कुर्सी के ऊपर खड़ी कन्चन की जांघों को पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया। कन्चन के भारी नितम्ब रामलाल के मुंह से सिर्फ़ दो इन्च ही दूर थे। रामलाल को पेटिकोट में से कन्चन की गुलाबी रंग की पैंटी की झलक मिल रही थी। उफ! ८० % चूतड़ तो पैंटी के बाहर थे। कन्चन के विशाल चूतड़ रामलाल के मुंह के इतने नज़दीक थे कि उसका दिल कर रहा था, कि उन विशाल चूतड़ों के बीच में मुंह डाल दे।

कन्चन बुरी तरह से शर्मा गयी लेकिन क्या करती? जल्दी से बल्ब लगाने की कोशिश करने लगी। बल्ब लगाने के लिये उसे हाथ छाती पर से हटाना पड़ा। रामलाल के दिल पे तो जैसे छुरी चल गयी। बहु की बड़ी बड़ी चूचिआं ब्लाउज से बाहर गिरने को हो रही थी। पेटिकोट इतना नीचे बंधा हुआ था की बहु के नितम्ब वहीं से शुरु हो जाते थे। कुर्सी अब भी हिल रहा थी। रामलाल ने इस सुनहरे मौके का पूरा फायदा उठाया। उसने अपने पैर से कुर्सी को और हिला दिया।

बहु गिरने को हुई तो रामलाल ने उसकी जांघों को अपनी ओर खींच कर और अच्छी तरह जकड़ लिया। जांघों को अपनी ओर खींचने से कन्चन के चूतड़ पीछे की ओर हो गये और रामलाल का मुंह बहु के विशाल चूतड़ों के बीच की दरार में घुस गया। ऊफ क्या मादक खुश्बू थी बहु के बदन की। करीब १० सेकंड तक रामलाल ने अपना मुंह बहु के चूतड़ों की दरार में दबा के रखा। पेटिकोट पैंटी समैत बहु के चूतड़ों के बीच फंस गया। कन्चन ने किसी तरह जल्दी से बल्ब लगाया।

"पिताजी बल्ब लग गया।"

"ठीक है बहु।" ये कहते हुए रामलाल ने एकदम से उसकी टांगें छोड़ दी। जैसे ही रामलाल ने कन्चन की टांगें छोड़ी कन्चन का बेलैन्स बिगड़ गया और वो आगे की ओर गिरने लगी। रामलाल ने एकदम पीछे से हाथ डाल कर उसे गिरने से बचा लिया। लेकिन उसका हाथ सीधा कन्चन की बड़ी बड़ी चूचिओं पे पड़ा। अब कन्चन की दोनों चूचिआं रामलाल के हाथों में थी। रामलाल ने उसे चूचिओं से पकड़ के अपनी ओर खींच लिया। अब सीन ये था की रामलाल पीछे से बहु से चिपका हुआ था। बहु के विशाल चूतड़ रामलाल के सख्त होते हुए लंड से सटे हुए थे और बहु की दोनों चूचिआं रामलाल के हाथों में दबी हुई थी। ये सब तीन सेकेन्ड में हो गया।

"अरे बहु मैं ना पकड़ता तो तुम तो गिर जाती। ना जाने कितनी चोट लगती। ऐसे काम तुम्हें खुद नहीं करने चाहिये। हमें कह दिया होता। आगे से ऐसा नहीं करना" रामलाल बहु की चूचिओं पर से हाथ हटाता हुआ बोला।

"जी पिताजी। आगे से ऐसा नहीं करुंगी।"

रामलाल जल्दी से बाहर चला गया क्युंकि अब उसका लंड तन गया था और बहु को नज़र आ जाता। लेकिन कन्चन भी अनाड़ी नहीं थी। उसे अच्छी तरह पता था की ससुर जी ने मौके का पूरा फायदा उठाया था। उसकी जांघों को जिस तरह से उन्होनें पकड़ा था वैसे एक ससुर अपनी बहु की टांगें नहीं पकड़ता। उसके चूतड़ों के बीच में मुंह देना, और फिर उसे गिरने से बचाने के बहाने दोनों चूचिआं दबा देना कोई इत्तेफ़ाक नहीं था। और फिर उसे गिरने से बचाने के बाद उसके चूतड़ों के साथ ऐसे चिपक के खड़े थे कि कन्चन को उनका लंड अपने चूतड़ों पर रगड़ता हुआ महसूस हो रहा था। ससुरजी जल्दी से बाहर तो चले गये लेकिन उनकी धोती का उठाव कन्चन से नहीं छुपा था। वो समझ गयी की ससुर जी का लंड तना हुआ था। कन्चन नहाने के लिये बाथरूम में चली गयी। लेकिन उसके चूतड़ों के बीच ससुरजी के मुंह का स्पर्श और उसकी चूचिओं पे उनके हाथ का स्पर्श उसे अभी तक महसूस हो रहा था। उसकी चूत गीली होने लगी और पहली बार उसने ससुर जी के नाम से अपनी चूत में उंगली डाल कर अपनी वासना की भूख को शान्त करने की कोशिश की।

अब तो कन्चन ने भी ससुर जी को रिझाने का प्लान बनना शुरु कर दिया। एक बार फिर सासु मां को ससुर जी के साथ शहर जाना था। इस बार रामलाल ने पहले ही किसी को गाड़ी के लिये बोल दिया था। उसने इस बार भी माया देवी को किसी के साथ गाड़ी में शहर भेज दिया। माया देवी के जाने के बाद वो कन्चन से बोला कि वो खेतों में जा रहा है और शाम तक आयेगा। रामलाल के जाने के बाद कन्चन ने घर का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया और कपड़े धोने और नहाने की तैयारी करने लगी। उधर रामलाल थोड़ी दूर जा के वापस आ गया। उसका इरादा फिर पहले की तरह अपने कमरे में साईड के दरवाज़े से घुस कर बहु को देखने का था। वो सोच रहा था कि अगर किस्मत ने साथ दिया तो बहु को नंगी देख पायेगा। कन्चन किसी काम से छत पे गयी। अचानक जब उसने नीचे झांका तो उसकी नज़र चुपके से अपने कमरे का ताला खोलते हुए रामलाल पे पड़ गयी। कन्चन समझ गयी कि रामलाल चुपचाप अपने कमरे में क्यों घुस रहा है। अब तो कन्चन ने सोच लिया कि आज वो जी भर के ससुर जी को तड़पाएगी। मर्दों को तड़पाने में तो वो बचपन से माहिर थी। वो नीचे आ कर अपने कमरे में गयी लेकिन कमरे का दरवाज़ा खुला छोड़ दिया। उधर रामलाल अपने कमरे में से बहु के कमरे में झांक रहा था। कन्चन शीशे के सामने खड़ी हो कर अपनी साड़ी उतारने लगी। उसकी पीठ रामलाल की ओर थी। रामलाल सोच रहा था कि बहु कितनी अदा के साथ साड़ी उतार रही है जैसे कोई मर्द सामने बैठा हो और उसे रिझाने के लिये साड़ी उतार रही हो।

उसे क्या पता था कि बहु उसी को रिझाने के लिये इतने नखरों के साथ साड़ी उतार रही थी। धीरे धीरे बहु ने साड़ी उतार दी। अब वो सिर्फ़ पेटिकोट और ब्लाउज में ही थी। कन्चन पेटिकोट और ब्लाउज में ही आंगन में आ गयी। उसे मालूम था की ससुर जी की नज़रें उस पर लगी हुई हैं। सफ़ेद पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु की काली रंग की कच्छी साफ़ नज़र आ रही थी। खास कर जब बहु चलती तो बारी बारी से उसके मटकते हुए चूतड़ों पे पेटिकोट टाईट हो जाता और कच्छी की झलक भी और ज़्यादा साफ़ हो जाती। रामलाल का लौड़ा हरकत करने लगा था। बहु आंगन में बैठ के कपड़े धोने लगी। पानी से उसका ब्लाउज गीला हो गया था और रामलाल को अन्दर से झांकती हुई ब्रा भी नज़र आ रही थी। थोड़ी देर बाद बहु अपने कमरे में गयी और फिर शीशे के सामने खड़े हो के अपनी जवानी को निहारने लगी। अचानक बहु ने अपना ब्लाउज उतार दिया। वो अब भी शीशे के सामने खड़ी थी और उसकी पीठ रामलाल की ओर थी। फिर धीरे से बहु का हाथ पेटिकोट के नाड़े पे गया। रामलाल का तो कलेजा ही मुंह को आ गया। वो मनाने लगा - हे भगवान बहु पेटिकोट भी उतार दे। भगवान ने मानो उसकी सुन ली। बहु ने पेटिकोट का नाड़ा खींच दिया और अगले ही पल पेटिकोट बहु के पैरों में पड़ा हुआ था। अब बहु सिर्फ़ कच्छी और ब्रा में खड़ी अपने आप को शीशे में निहार रही थी। क्या तराशा हुआ बदन था।

भगवान ने बहु को बड़ी फुर्सत से बनया था। बहु की ब्रा बड़ी मुश्किल से उसकी चूचिओं को सम्भाले हुए थी और उसके विशाल चूतड़! छोटी सी काली कच्छी बहु के उन विशाल चूतड़ों को सम्भालने में बिल्कुल भी कामयाब नहीं थी। ८०% चूतड़ कच्छी के बाहर थे। शीशे में अपने को निहारते हुए बहु ने दोनों हाथ सिर के ऊपर उठा दिये और बाहों के नीचे बगलों में उगे हुए बालों का निरीक्षण करने लगी। बाल बहुत ही घने और काले थे। रामलाल सोच रहा था की शायद बहु को बगलों में से बाल साफ़ करने का टाईम नहीं मिला था वर्ना शहर की लड़कियां तो बगलों के बाल साफ़ करती हैं। अगर बगलों में इतने घने बाल थे तो चूत पे कितने घने बाल होंगे। इतने में बहु ने झाड़ू उठा ली और कमरे में झाड़ू लगाने लगी। उसकी पीठ अब भी रामलाल की ओर थी। कन्चन अच्छी तरह जानती थी इस वक्त रामलाल पे क्या बीत रही होगी।

झाड़ू लगाने के बहाने वो आगे को झुकी और अपने विशाल चूतड़ों को बहुत ही मादक तरीके से पीछे की ओर उठा दिया। कन्चन जानती थी की उसके चूतड़ मर्दों पे किस तरह कहर ढाते हैं। रामलाल का कलेजा मुंह में आ गया। उसकी आखें तो मानो बाहर गिरने को हो रही थी। जिस तरह से कन्चन आगे झुकी हुई थी और उसके चूतड़ पीछे की ओर उठे हुए होने के कारण दोनों चूतड़ ऐसे फैल गये थे कि उनके बीच में कम से कम तीन इंच का फासला हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों चूतड़ बहु की छोटी सी कच्छी को निगलने के लिये तैयार हो। रामलाल को कोई शक नहीं था कि जैसे ही बहु सीधी होगी उसके विशाल चूतड़ उस बेचारी छोटी सी कच्छी को निगल जाएंगे। कन्चन भी जानती थी कि जब वो सीधी होगी तो उसकी पैंटी का क्या हाल होगा। वही हुआ। बहु झाड़ू लगाते लगाते सीधी हुई और उसके विशाल चूतड़ों ने भूखे शेरों की तरह उसकी कच्छी को दबोच लिया। अब कच्छी उसके दोनों चूतड़ों के बीच में फंसी हुई थी। रामलाल का लंड फनफनाने लगा। कन्चन ये झाड़ू लगाने का खेल थोड़ी देर तक खेलती रही। बार बार सीधी हो जाती। धीरे धीरे उसकी पैंटी चूतड़ों पे से सिमट के उनके बीच की दरार में फंस गयी।

कन्चन जानती थी की इस वक्त ससुर जी पे क्या बीत रही होगी। लेकिन अभी तो खेल शुरु ही हुआ था। कन्चन फिर से शीशे के सामने खड़ी हो गयी। शीशे में अपने खूबसूरत बदन को निहारते हुए बड़ी अदा के साथ उसने चूतड़ों के बीच फंसी पैंटी को निकाल के ठीक से स्थापित किया। फिर उसने धुला हुआ पेटिकोट और ब्लाउज निकाला। अब कन्चन शीशे के सामने खड़ी हो गयी और अपनी ब्रा उतार दी। उसकी पीठ रामलाल की ओर थी। ब्रा उतारने के बाद उसने बड़ी अदा के साथ अपनी पैंटी भी उतार दी। अब वो शीशे के सामने बिल्कुल नंगी खड़ी थी। रामलाल के तो पसीने ही छूट गये। बहु को इस तरह नंगी देख कर उसके मुंह में पानी आ रहा था। क्या जानलेवा बदन था बहु का। रामलाल मना रहा था कि बहु घूम जाए तो उसकी चूचिओं और चूत के भी दर्शन हो जाएं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब बहु अचानक आगे की ओर झुकी मानो ज़मीन पे पड़ी हुई किसी चीज़ को उठाने की कोशिश कर रही हो। ऐसा करने से उसके चूतड़ पीछे की ओर उठ गये और बहु की गोरी गोरी जांघों और चूतड़ों के बीच से झांटों के काले काले बाल झांकने लगे। कन्चन फिर से सीधी हुई और रामलाल की ओर पीठ करे हुए ही ब्लाउज पहना और फिर पेटीकोट पहन लिया। रामलाल जानता था कि बहु ने ब्लाउज के नीचे ब्रा और पेटिकोट के नीचे कच्छी नहीं पहनी है। अब कन्चन उतारे हुए कपड़े ले कर आंगन में धोने आ गयी। बिना कच्छी के बहु के चूतड़ चलते वक्त ज़्यादा हिल रहे थे। कपड़े धोते हुए उसका ब्लाउज गीला हो गया। अन्दर से ब्रा ना पहना होने के कारण रामलाल को बहु की बड़ी बड़ी चूचिआं और निप्पल साफ़ नज़र आ रहे थे।

बहु पैर मोड़ के बैठी थी। पेटिकोट उसकी मुड़ी हुई टांगों के बीच में फंसा हुआ था। रामलाल मना रहा था कि किसी तरह पेटिकोट का निचला हिस्सा बहु की टांगों से निकल जाए। रामलाल को बहुत इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। कन्चन का भी वही इरादा था। इस कला में तो वो बहुत माहिर थी। एक बार पहले भी अपने देवर के साथ ऐसा ही कुछ कर चुकी थी। कपड़े धोते धोते उसने पेटिकोट का निचला हिस्सा अपनी मुड़ी हुई टांगों से छूट के गिरने दिया। कन्चन उसी प्रकार कपड़े धोने बैठी हुई थी जैसे औरतें पेशाब करने बैठती हैं। कन्चन को मालूम था की अब उसकी नंगी चूत पूरी तरह फैली हुई थी। क्युंकि कमला ने उसकी चूत के छेद के आस पास के बाल काट दिये थे, इसलिये अब तो उसकी फूली हुई चूत की दोनों फांकें, उनके बीच का कटाव और कटाव के बीच में से चूत के बड़े बड़े होंठ साफ़ नज़र आ रहे थे। रामलाल को तो मानो लकवा मार गया। उसे डर था की कहीं उसके दिल की धड़कन रुक ना जाए। लेकिन अगले ही पल कन्चन ने पेटिकोट फिर से ठीक कर लिया। रामलाल को उसकी चूत के दर्शन मुश्किल से तीन सेकेन्ड के लिये ही हुए। गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच में घना जंगल और उस जंगल में से झांकती फूली हुई वो चूत ! क्या गज़ब का नज़ारा था। बहु की चूत के होंठ ऐसे खुले हुए थे मानो बरसों से प्यासे हों। ऊफ क्या लम्बी घनी झांटें थी बहु की। कपड़े धोने का नाटक करते हुए कन्चन ने ब्लाउज और पेटिकोट खूब गीला कर लिया था। भीगा हुए ब्लाउज और पेटिकोट कन्चन के बदन से चिपका जा रहा था। कन्चन काफ़ी देर तक ससुरजी को इसी तरह तड़पाती रही।